Wednesday, 23 August 2017

जीवन मे जहर भाग 1 अंक 4

जीवन मे जहर भाग 1 अंक 4 गतांग से आगे ..

संतोष के चेहरे पर सदैव दिखावटी हंसी रहती मगर मन मे पारिवारिक कलह को लेकर पीड़ा थी । हर एक तरीके अपनाए की शांति व इंदु देवी का आपसी तालमेल बेठ जाए । इंदुदेवी उम्र के साथ मधुमेह, ब्लड प्रेशर की शिकार थी । इंदुदेवी शारीरिक समस्या के चलते कुछ ज्यादा ही चीड़ चिड़ी हो गयी । उधर शांति भी मानसिक रूप से तो  परेशान थी ही कुछ स्वास्थ्य भी साथ नही देता । हर पल अपने बच्चो की सोचती ओर बच्चो को लेकर छोटी छोटी बातों पर कलह की स्थिति उत्त्पन कर देती वैसे शांति की कुछ हद तक बच्चो की चिंता स्वाभाविक भी थी क्यों कि वह खुद एक माँ थी और माँ की ममता छलकना स्वाभाविक भी था । मगर शांति की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि जिस बात को घर मे संतोष या पूरे परिवार के सामने प्रेम से भी रखकर हर समस्या का समाधान कर सकती थी । मगर शांति प्रेम से बात न कर बात का बतंगड़ बना देती एक कहावत भी है जो कार्य प्यार से होता है लड़ झगड़ कर उसे कभी हांसिल नही किया जा सकता । शांति का एक बार  झगड़ना अर्थात पारिवारिक सामंजस्य को वापस पटरी पर आने में 2 माह लग जाते । वैसे शांति व सास इंदुदेवी दोनो की अनबन इस पारिवारिक मतभेद ने हमेशा ज्यादा बढ़ाया । आचार्य तरुण सागर जी का एक कटु प्रवचन की लड़ लो झगड़ लो मगर बातचीत कभी बन्द मत करो बातचीत बन्द करने से सुलह के सारे रास्ते बंद हो जाते है । आचार्य तरुण सागर जी का यह कथन शांति व सास इंदुदेवी पर सटीक साबित हो रहा था । उधर शांति की एक पुत्री अर्चना भी शांति की हरकतों से बहुत दुखी थी मगर माँ के प्रति ममता ओर डर से बिचारी कुछ बोल ही नही पाती । गुमसुम होकर माँ शांति का साथ देती । कभी कभी माँ शांति को समझाने की कोशिश भी करती मगर शांति की जिद्द के आगे नतमस्तक हो जाती । शांति का पुत्र ज्यादा कुछ बोलता नही । इंदुदेवी का भी पौत्र व पोत्रि अर्चना पर ज्यादा दिल नही था क्यों शांति व इंदु देवी के मतभेदों ने सभी की खुशिया छीन भिन्न कर दी । संतोष भी अर्चना व पुत्र को प्यार तो करता था मगर शांति से होते मतभेद कभी कभार नफरत में बदल जाता । वैसे संतोष अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह समझता भी था और जिम्मेदारी निभाना भी चाहता मगर उसे भी जब क्रोध आता तो वह भी आग बबूला हो जाता और शांति व संतोष के कलह का शिकार बनती अर्चना । अर्चना को भी अब शिकायत रहने लगी कि उसके पापा संतोष व माँ शांति दोनो के झगड़े के बीच मे अर्चना को दोषी ठहरा देता । कुछ हद तक संतोष की भी गलती थी मगर संतोष यही सोचता  कि अर्चना अपनी माँ शांति को समझाती क्यों  नही । अर्चना भी एक छोटा सा जॉब करती वैसे संतोष उससे सहमत नही था कि बेटी अर्चना जॉब करे क्यों कि संतोष को अर्चना की छोटी सी सेलेरी से कोई मतलब नही था । मगर संतोष न चाहते हुए भी अर्चना को जॉब की स्वीकृति दी तो शांति की जिद्द के कारण .. । संतोष से  दबे मन से अर्चना को जॉब की स्वीकृति दी थी यू कहा जाए मजबूरी में स्वीकृति दी । अर्चना घर के कार्य मे माँ शांति का भी साथ देती । मगर छोटी उम्र की होने के नाते इतनी समझ नही थी कि माँ शांति को अच्छे से समझा सके ।
संतोष ........ अगले अंक में
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही ).

Tuesday, 22 August 2017

डोकलाम समाधान पर राजनाथ की उम्मीद को चीन ने बताया धता, कहा- भारत को पीछे हटना ही होगा

चीन ने डोकलाम गतिरोध के जल्दी हल निकलने के गृह मंत्री राजनाथ सिंह की उम्मीद को खारिज करते हुए कहा है कि भारत को बिना शर्त अपनी सेना हटानी ही होगी. गौरतलब है कि एक दिन पहले ही गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने यह उम्मीद जताई थी कि चीन इस मसले को हल करने के लिए कुछ 'सकारात्मक कदम' उठाएगा.सोमवार को राजनाथ सिंह ने कहा था कि डोकलाम गतिरोध का जल्दी ही कोई हल निकलेगा और भारत ने कभी भी किसी देश पर न तो कोई हमला किया है और न ही उसका कोई विस्तारवादी स्वभाव है. राजनाथ सिंह ने उम्मीद जाहिर की थी कि इस गतिरोध को दूर करने के लिए चीन कुछ सकारात्मक कदम उठाएगा.
लेकिन मंगलवार को चीन ने भारतीय गृह मंत्री की इस उम्मीद को धता बताते हुए फिर से दुष्प्रचार का सहारा लिया है. चीन ने आरोप लगाया है कि भारतीय सेना ने 'अवैध तरीके से सीमा पार किया है.'  
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनयिंग ने कहा, 'भारत ने डोकलाम में चीनी सड़क निर्माण गतिविधियों को रोकने के लिए हास्यास्पद तर्क दिए हैं. इसलिए इस समस्या को दूर करने के लिए बस एक पूर्व शर्त है कि भारत अपने सैनिक और साजो-सामान बिना शर्त हटाए.'
गौरतलब है कि सिक्किम सीमा सेक्टर के पास डोकलाम में भारत और चीनी सेना दो महीने से भी ज्यादा समय से आमने-सामने है. यह गतिरोध तब शुरू हुआ जब इस इलाके में चीनी सेना द्वारा किए जाने वाले सड़क निर्माण कार्य को भारतीय सैनिकों ने रोक दिया. भारत की चिंता यह है कि अगर चीन  में सड़क बनाने में कामयाब रहता है तो उसके लिए कभी भी उत्तर-पूर्व के हिस्से तक शेष भारत की पहुंच को रोक देना आसान हो जाएगा. डोकलाम इलाके को भूटान अपना मानता है, लेकिन चीन का दावा है कि यह उसके क्षेत्र में आता है.

युवा CEO के कार्यक्रम में बोले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कहा- 'विकास' को हम मास मूवमेंट बना कर रहेंगे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज नई दिल्ली में देश के युवा कार्यकारी अधिकारियों (CEO) के साथ बातचीत की

नई दिल्ली: दिल्ली में कई कंपनियों के युवा सीईओ को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि आजादी के लिए दीवानों की कमी नहीं थी. सैकड़ों सालों से लोग देश के लिए बलिदान देते चले आ रहे थे.
उन्होंने कहा कि 2017-2022 तक हमें कहां जाना है. हमें इस पर विचार करना होगा. उन्होंने कहा कि गांधी जी ने क्या किया, लोग दीवाने थे आजादी के लिए. गांधी जी ने सभी को आजादी का सैनिक बना दिया. गांधी जी ने लोगों के मन में आजादी का भाव पैदा किया और सफाई कर्मी अपना काम आजादी के लिए करने लगा. किसान किसानी आजादी के लिए करने लगा. शिक्षक अपना काम आजादी के लिए कर रहा था. यह काम गांधी जी ने किया. इस तरह गांधी जी ने आजादी के मूवमेंट को मास मूवमेंट बनाया
आज हमारे देश में हर सरकार ने आगे बढ़ने का प्रयास किया है. लेकिन आजादी के बाद विकास मास मूवमेंट नहीं बन पाया. हमें यह करना है. हम यह करके रहेंगे.
पीएम मोदी ने कहा कि आज हम 2017 में है और 2022 तक हमें यह संकल्प लेना है कि हमें कहां पहुंचना है. हमें आधुनिक भारत के लिए काम करना है. उन्होंने युवा सीईओ से कहा कि आप भी देश की इस प्रगति में सैनिक बन सकते हैं. प्रयास करने से रास्ते मिलते जाएंगे.

नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश के हर नागरिक को लगना चाहिए कि ये देश मेरा है. सरकार के लिए जनहित सबसे ऊपर है. उन्होंने कहा कि सरकार ने सोचने का तरीका बदला है. देश कहां जाए ये सरकार की जिम्मेदारी है. सरकार के लिए नागरिकों का कल्याण और उनकी खुशी सर्वोपरि है. उन्होंने कहा कि मेरी इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह है कि हर व्यक्ति को लगे कि यह देश मेरा है

जीवन मे जहर भाग 1 अंक 3 गतांग से आगे

जीवन मे जहर भाग - 1 अंक 3
संतोष सभी को समझाते समझाते खुद नही समझ पाता कि इसका रास्ता क्या निकालू एक असमंजस  की स्थिति में संतोष मानसिक तनाव में रहता था । शांति के पीहर पक्ष के कुछ लोग उसे भी समझाते तो कभी संतोष खुद अपने ससुराल वालों से बात करता मगर शांति व संतोष के इस बंधन को सिर्फ दोनो को ही मिल बैठकर समझने की सलाह शांति के पीहर वाले भी देते । शांति की माँ दुर्गा देवी को शांति इकलौती पुत्री थी सभी माँ जैसे दुर्गा देवी भी शांति को बहुत प्यार करती थी । वैसे बेटी की शादी के बाद माँ का फर्ज यही होता है बेटी को सिर्फ प्यार के खातिर उसकी बात सुनकर अपने दामाद संतोष से प्यार से रहने की सलाह देनी चाहिए मगर दुर्गादेवी बेटी के अतिप्रेम से उसे सलाह न देकर बेटी के दुख का ही रोना रोती थी । शांति का एक भाई शांति की पक्ष लेता तो दो भाई शांति को खरी खोटी सुनाते ओर प्यार से रहने की सलाह भी देते मगर शांति थी कि किसी की नही सुनती ।।इधर ससुराल में शांति की सास इंदुदेवी का ओर शांति का आपसी प्रेम तो संतोष ने देखा नही सिर्फ देखा तो शांति व इंदुदेवी का फुला हुआ मुह । कभी संतोष अपनी माँ इंदुदेवी व शांति को अगर खुश देखता वैसे दोनो को हंसते हुए देखना ईद का चांद जैसा ही होता उस संतोष दिल ही दिल बड़ा खुश होता । संतोष अपने व्यावसायिक कार्य संम्पन कर के घर जाता दोनो के कोप रूपी चेहरे को देख दिन भर थकान और निराश कर देती ।
आगे पढ़ें 23 अगस्त को भाग 1 अंक 4
कथा लेखक - उत्तम विद्रोही ( जैन )

Monday, 21 August 2017

जिंदगी में जहर भाग 1 अंक 2

जिंदगी में जहर भाग 1 अंक 2
कोमल ने शांति की सखी होने का फ़र्ज़ निभाते हुए हर सही बात में साथ मे साथ देने का आस्वाशन दिया । उधर शांति अपनी जिद्दी प्रवृति पर अड़ी थी । न संतोष को समझने की कोशिश करती न अपने भविष्य को देख रही थी शांति ने कभी अपने अहम को नजर अंदाज करने का नही सोचा संतोष यही चाहता था येनकेन प्रकारेण शांति न अपने जीवन को बर्बाद करे ओर संतोष चाहता था कि शांति सदा मेरे साथ रहे । उधर संतोष अपने माँ व पिता और बच्चो के प्रेम में इतना उलझ गया कि बहुत बार शांति की खुशियों को नजर अंदाज कर देता संतोष यह जानते हुए भी की में शांति को हर वह खुशी नही दे पा रहा जो शांति सदा उससे अपेक्षा करती थी ।।शांति कुछ हद तक सही भी थी क्यों कि शांति की अपने पति से कुछ तो अपेक्षा थी उसका पति संतोष उसकी हर तकलीफ सुने मगर संतोष ठहरा की शांति को चाहते हुए भी हर बात का समर्थन नही करता  क्यों कि संतोष भी एक मजधार में उलझा हुआ था एक तरफ पत्नी शांति की खुशिया ओर दूसरी तरफ बुजुर्ग माँ व बाप न उसे माँ बाप समझते न शांति बिचारे संतोष की हालत तो यह हो गयी दोनो तरफ से पिसता जा रहा था । जबकि संतोष को शांति भी बहुत प्यार करती और संतोष के माता पिता भी बहुत प्यार करते थे । मगर दोनो पलडो की ना समझी ने संतोष की जिंदगी में जहर गोल दिया ।मरता क्या न करता बिचारा संतोष कभी शांति को समझाता तो कभी अपने माँ पापा को मगर कोई समझने को तैयार नही क्यों कि एक तरफ शांति पढ़ी लिखी होने के बाद जिद्दी थी और दूसरी तरफ संतोष के माता पिता पुराने विचारो के होने के कारण समझने को तैयार नही थे ।
......जिंदगी में जहर भाग 1 अंक 2 
अगला अंक 3 ओर 4 का इंतजार करे   प्रेषित कल 22 अगस्त को
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही )

नेकी का मार्ग दिखाता है पर्युषण

ज्ञान, दर्शन और चरित्र की आराधना का पर्व है पर्युषण पर्व। पर्युषण व्यक्ति और समाज को जोड़ने का कार्य करता है। यह पर्व व्यक्ति के अंदर की कलुषित भावना को नष्ट कर आत्मा को शुद्ध कर उसे नेकी का मार्ग दिखाता है। इसीलिए यह कहा गया है कि यह पर्व कोई  त्योहार नहीं है अपितु जीवन शुद्धि का मन्त्र है। पर्युषण इस वर्ष शुरू हो चुके है !
पर्युषण का शाब्दिक अर्थ है− आत्मा में अवस्थित होना। पर्यूषण जैन धर्म का मुख्य पर्व है। श्वेतांबर इस पर्व को 8 दिन और दिगंबर इसे दस दिन तक मनाते हैं। पर्युषण अंतरआत्मा की आराधना का पर्व है। यह अंतरंग में तप, त्याग और साधना का संदेश देता हैं। आज समाज में असहिष्णुता का बोलबाला है। हमारे ऋषि मुनियों, संतों और गुरुओं ने हमें शांति ,भाईचारा, सद्भावना और अहिंसा का पाठ पढ़ाया था। मगर जैसे जैसे देश और समाज ने भौतिक तरक्की की हमने अपने महापुरुषों के बताये मार्ग को छोड़ दिया जिसके फलस्वरूप समाज कमजोर हुआ। पर्युषण का पर्व ऐसे विषम समय में हमारी आत्मा को शुद्ध कर ईश्वर के बताये नेकी के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यह पर्व हमारी गलतियों  को रेखांकित कर हमें पश्चाताप का अवसर प्रदान करता है।   
जैन संस्कृति में जितने भी पर्व व त्योहार मनाए जाते हैं, लगभग सभी में तप एवं साधना का विशेष महत्व है। जैनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है पर्युषण पर्व। पर्युषण पर्व का शाब्दिक अर्थ है-आत्मा में अवस्थित होना। पर्युषण का एक अर्थ है-कर्मों का नाश करना। कर्मरूपी शत्रुओं का नाश होगा तभी आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित होगी। यह सभी पर्वों का राजा है। इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है, जिसमें तप कर कर्मों की निर्जरा कर अपनी काया को निर्मल बनाया जा सकता है। पर्युषण पर्व को आध्यात्मिक दीवाली की भी संज्ञा दी गई है। जिस तरह दीवाली पर व्यापारी अपने संपूर्ण वर्ष का आय-व्यय का पूरा हिसाब करते हैं, गृहस्थ अपने घरों की साफ- सफाई करते हैं, ठीक उसी तरह पर्युषण पर्व के आने पर जैन धर्म को मानने वाले लोग अपने वर्ष भर के पुण्य पाप का पूरा हिसाब करते हैं। वे अपनी आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की साफ-सफाई करते हैं।
पर्युषण महापर्व मात्र जैनों का पर्व नहीं है, यह एक सार्वभौम पर्व है। पूरे विश्व के लिए यह एक उत्तम और उत्कृष्ट पर्व है, क्योंकि इसमें आत्मा की उपासना की जाती है। संपूर्ण संसार में यही एक ऐसा उत्सव या पर्व है जिसमें आत्मरत होकर व्यक्ति आत्मार्थी बनता है । पर्युषण आत्म जागरण का संदेश देता है और हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है। यह आत्मा द्वारा आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है। पर्युषण पर्व जैन धर्मावलंबियों का आध्यात्मिक त्योहार है। पर्व शुरू होने के साथ ही ऐसा लगता है मानो किसी ने दस धर्मों की माला बना दी हो। यह पर्व मैत्री और शांति का पर्व है। यह पर्व अपने आपमें ही क्षमा का पर्व है। इसलिए जिस किसी से भी आपका बैरभाव है, उससे शुद्ध हृदय से क्षमा मांग कर मैत्रीपूर्ण व्यवहार करें।  
भारतीय संस्कृति का मूल आधार तप, त्याग और संयम हैं। जैन धर्म में दस दिवसीय पर्युषण पर्व एक ऐसा पर्व है जो उत्तम क्षमा से प्रारंभ होता है और क्षमा वाणी पर ही उसका समापन होता है। क्षमा वाणी शब्द का सीधा अर्थ है कि व्यक्ति और उसकी वाणी में क्रोध, बैर, अभिमान, कपट व लोभ न हो। दशलक्षण पर्व, जैन धर्म का प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण पर्व है। दशलक्षण पर्व संयम और आत्मशुद्धि का संदेश देता हैं। दशलक्षण पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है लेकिन मुख्य रूप से यह पर्व भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से लेकर चतुर्दशी तक मनाया जाता है। दशलक्षण पर्व में जैन धर्म के जातक अपने मुख्य दस लक्षणों को जागृत करने की कोशिश करते हैं। जैन धर्मानुसार दस लक्षणों का पालन करने से मनुष्य को इस संसार से मुक्ति मिल सकती हैं। संयम और आत्मशुद्धि के इस पवित्र त्यौहार पर श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक व्रत-उपवास रखते हैं। 
मंदिरों को भव्यतापूर्वक सजाते हैं, तथा भगवान महावीर का अभिषेक कर विशाल शोभा यात्राएं निकाली जाती है। इस दौरान जैन व्रती कठिन नियमों का पालन भी करते हैं जैसे बाहर का खाना पूर्णत वर्जित होता है। दिन में केवल एक समय ही भोजन करना आदिपर्युषण पर्व की समाप्ति पर जैन धर्मावलंबी अपने कषायों पर क्षमा की विजय पताका फहराते हैं और फिर उसी मार्ग पर चलकर अपने अगले भव को सुधारने का प्रयत्न करते हैं। आइए! हम सभी अपने राग-द्वेष और कषायों को त्याग कर भगवान महावीर के दिखाऐ मार्ग पर चलकर विश्व में अहिंसा और शांति का ध्वज फैलाएं। क्षमा करें और कराएं।
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही ) 

लघुकथा - जीवन मे जहर

लघु कथा - जीवन मे जहर -  भाग 1
एक अच्छे कुल में 3 भाइयो के बाद एक लड़की का जन्म हुआ लड़की का नाम माता पिता ने बड़े प्यार से शांति रखा । शांति जन्म से बहुत रूपवान व पढ़ने में कुशल थी स्वभाव से सदैव हंसमुख थी मगर स्वभाव में एक कमी थी कि बहुत गुस्सेल थी । बचपन में पिता का देहांत हो गया । माँ व भाइयो ने एक अच्छा रिश्ता देखकर शादी भी करा दी । मगर शांति ससुराल में सदैव पारिवारिक संघर्ष में रही । संघर्ष करते करते उसके जीवन मे गुस्सा व चिड़चिड़ापन बहुत बढ़ गया । एक पवन(हवा) का ऐसा झोका आया शांति के पति स्वर्गसिधार गए । कुछ संघर्ष के बाद अपनी मेहनत व होंसले से  बच्चो का व खुद पेट पाल रही थी । कुछ वर्षो बाद शांति की एक अनायास मुलाकात संतोष से हुई संतोष नाम से ओर स्वभाव से संतोषी था मगर थोड़ा भावुक था । शांति और संतोष ने शादी कर ली । कुछ वर्षों तक सब कुछ ठीक चला मगर संतोष अपनी पत्नी शांति को बहुत प्यार करता था दिलोजान से चाहता था मगर वह हजार खुशी देने के बाद शांति से एक अपेक्षा  रखता  था कि शांति सदैव उसके माता पिता व उसके बच्चो को सदैव भरपूर प्यार , मान सन्मान दे । शांति मन की तो अच्छी थी मगर गुस्सा उसके सदैव नाक पर रहता था । बात बात पर शांति नाम के विपरीत  वाद विवाद को जन्म दे देती । परिणाम यह हुआ शांति व संतोष दोनो एक दूसरे से अताह प्यार करने के बावजूद दोनो उखड़े उखड़े रहते उधर संतोष की परेशानी यह थी कि एक तरफ कुवा तो दूसरी तरफ खाई । एक तरफ अपने माता पिता व बच्चो का सोचता दूसरी तरफ शांति से अति प्रेम में उलझा था खुद समझ ही नही पा रहा था कि क्या करूँ ओर सदैव मानसिक तनाव में रहते रहते संतोष भी चिड़चिड़ा हो गया अब शांति द्वारा जब भी कोई वाद विवाद खड़ा होता संतोष ओर शांति दोनो में दूरियां बढ़ती जाती कुछ इसी तरह दोनो के जीवन मे आये दिन कलह ने घर मे निवास स्थान बना लिया । शांति की एक महिला मित्र कोमल कानूनी सलाहकार थी बिल्कुल अपने पेशे से विपरीत स्वभाव जैसा नाम वैसा ही व्यवहार उसने शांति व संतोष दोनो के बीच सामंजस्य बिठाने की सोची ओर दोनो को मार्गदर्शन देती रही ..... आगे अगली कड़ी में
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही )