Thursday, 9 November 2017

क्या आप चाहते है आखिर भ्रष्टाचार और अपराध से कैसे मुक्त हुआ जाए ?

जब भी मन मे कोई विचार उठता है मेरे विचार ओर मेरी कलम मुझे लिखने को प्रोत्साहित करती है ! वेसे कलम से लिखने की आदत कुछ कम हो गयी कंप्यूटर पर अंगुलिया चलने लगती है ! अभी आखिर भ्रष्टाचार और अपराध से कैसे मुक्त हुआ जाए के विचारो के साथ लिखने बेठा हूं। समझ में नही आता कि क्या लिखूँ। सुबह से कुछ विचार आन्दोलित कर रहे हैं मनको। भ्रष्टाचार समाप्त करने का बीड़ा उठाया है कुछ लोगों ने, पर यह भ्रष्टाचार रूपी महारानी देश के कोने कोने में विविध स्वरूप धरे ऐसी जड़ जमा कर बैठी है कि किसी के भगाए नहीं भागती। कोई लाख नाक रगड़ ले। अभी नोटबन्दी के दोष गुन फिर से सभी दलों द्वारा गिनाए जा रहे हैं। यह सही है कि बहुत सारे फायदे हुए हैं इसके । लागू होते ही जो कुछ लोगों और कुछ पाटियों में हड़कंप मचा था, विरोध के स्वर उठे थे वे नोटबंदी के प्रभावक्षेत्र मे स्वयं के आ जाने के कारण ही ज्यादा थे। सामान्य जनता ने तब भी उसका समर्थन किया था, आज भी कमोवेश करती है। कुछ लोगों को बड़े बड़े नोटों के आने से कष्ट हुआ पर यह भी सच है कि जिनको अपनी अनैतिक कमाई को बचाना था, उन्होंने बचा ही लिया। और भ्रष्टाचार दूर करने में लगी संस्थाओं ने इसमें भी योगदान दिया ही। और जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो भ्रष्टाचार पर कैसे लगाम लगायी जा सकती है। यह तो निश्चित है कि दूरगामी प्रभाव अच्छे होंगे। एक बड़ी योजना में योजना के सारे सूत्र सीधे ही रहें,कहीं उलझें नहीं यह बहुत संभव नहीं हो सकता । विपक्ष एक बार गुजरात चुनाव के सुअवसर पर इस मुद्दे को तूल दे रहा है संजोग ही ऐसा आया नोटबंदी की प्रथम पुण्यतिथि भी इस चुनावी अवसर पर आ गयी ! कुछ लोगों का भ्रष्टाचार उजागर नहीं भी हो सका। भ्रष्टाचार मात्र नियम कानून बनाने से समाप्त नहीं हो सकता इसके लिए लोगों की मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। इमानदारी को जीवन में प्रश्रय देने की आवश्यकता है। इस देश मे स्वतंत्रता के पश्चात् बेईमानी का क्रमशः विकास और ईमानदारी का ह्रास जितनी तेजी हुआहै उसे विपरीत दिशा मे मोड़ना इतना सहज नहीं।
जी एस टी निश्चय ही आतुरता और व्यग्रता में लागू कर देने के कारण कई अनियमितताओं को जन्म दे रहा है। न उपभोक्ता सन्तुष्ट हैं न व्यापारी। उपभोक्ताओं से बढ् चढ़ाकर मूल्य वसूले जा रहे हैं । किसी क्षेत्र में मूल्यों में राहत नहीं है। दवा विक्रेता कहते हैं अभी तो इसी दर पर जी एस टी जोड़कर दूँगा । नया स्टॉक आने तक तो सहना होगा। ऐसा ही बहुत सारे क्षेत्रों में हो रहा है। आलोचना अवश्यंभावी है। सरकार जी एस टी दरों मे कमी करने का प्रयास कर रही है। पर कितने प्रतिशत व्यापारी उसका लाभ उपभोक्ता तक पहुँचने देंगे, कहना मुश्किल है।यह भ्रष्टाचार है जो हर सुधारवादी योजना से निपटना जानती है और अनपढ़ को तो छोड़िए पढ़े लिखे लोगों को भी वेवकूफ बनाती है।
— प्रश्न है चारो ओर फैले इस भ्रष्टाचार की शिकायत किससे की जाए।सरकारी तंत्र का हर महकमा पुराने रुख पर कायम रहना चाहता है। अपराधियों के बजाय इनकी चौकसी की सख्त आवश्यकता है। थोड़ा भय अवश्य उत्पन्न हुआ है पर वह पर्याप्त नहीं । समाज मे नियम कानून न माननेवालों को पुलिस थाने की धमकी दी जाती है,या सम्बद्ध विभाग के अधिकारी को सूचना दी जाती है। मामले की जाँच पुलिस को सर्वप्रथम सुपुर्द की जाती है और भारतीय पुलिस का मनोबल इतना गिरा है कि थोड़े से प्रलोभन से वे कर्तव्य पथ से विचलित हो जाते हैं।
एक युग था—स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ दिनो पश्चात तक कि हमे पुलिस पर भरोसा था। मातापिता बाहर निकलते वक्त बच्चों को हिदायत देते थे कि जरूरत पड़ने पर वे पुलिस की सहायता लें। पर आज वे रक्षक नहीं भक्षक प्रतीत होते हैं। सामान्य जनता उनका सामना करने से कतराती है—पता नहीं वे किस केस में किसे फँसा दें ,व्यर्थ डंडे लगा दें। साक्षात प्रमाण है वह आरूषि हत्याकांड का केस जिसमें बलात मनगढंत कहानियाँ बना निर्दोष तलवार दम्पति को हत्यारा सिद्ध कर वर्षों जेल मे रहने को विवश कर दिया। मृतका का व्यर्थ ही चरित्र हनन किया। जाने कितने फेक एन्काउन्टर हुआ करते हैं। भ्रष्टाचार से मुक्ति में इनकी सहायता लेना नहीं चाहते लोग।अभी भी जिस घटना ने मन को विशेष उद्वेलित किया है,वह है रेयान के मासूम प्रद्युम्न के हत्याकांड का सीबीआई द्वारा रहश्य उजागर पुलिस ने उनके अनुसार एक निर्दोष बस कन्डक्टर को अपराधी साबित करने की कोशिश की। उस पर अनैतिक आचरण का भी दोषारोपण किया। अभी यद्यपि दोष पूरी तरह प्रमाणित नहीं हुआ पर विद्यालय के ही ग्यारहवीं कक्षा के विद्यार्थी ने अपराध स्वीकार किया है। वह छात्र विद्यालय बन्द करवाना चाहता था ताकि पैरेंट टीचर्स मीट न हो सके ओर परीक्षा टल सके। क्या विद्यार्थियों से पुलिस पूछताछ नहीं कर सकती थी। घटनास्थल की ठीक से जाँच नहीं कर सकती थी।? इस प्रकार की स्थितियों से इस महकमें पर से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है।
तब फिर अपराधों से कैसे मुक्त हुआ जाए और भ्रष्टाचारियों पर कैसे लगाम लगायी जाय –यह एक बड़ा प्रश्न है। अब विषय से अलग बात करू गुजरात चुनाव की घोषणा के साथ ही गुजरात चुनाव का लेकर उत्सुकता कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी है. ऐसा लग रहा है जैसे चक्रव्यूह में अभिमन्यु को फंसाने की तैयारी चल रही हो. इस युद्ध में एक तरफ तो गुजरात और भारत के गौरव मोदी हैं वहीँ दूसरी तरफ विपक्ष के साथ आरक्षण के समर्थक , नोटबंदी के विरोधी ओर जी एस टी विरोधी गुजरात में भी इस समय एकजुट हो गए हैं. ! प्रश्न उठता है कि बिहार में भाजपा को हरा दिया गया था मगर परिणाम क्या हुआ? बिहार का विकास पूरी तरह से ठप्प हो गया और नीतीश कुमार को मन मार कर फिर से भाजपा के साथ जाना पड़ा. मित्रों, मे मानता हु कि कुछ गलतियाँ भाजपा से भी हुई हैं. सेक्स सीडी मामले में एकतरफा कार्रवाई करते हुए पत्रकार को भीतर कर दिया लेकिन मंत्री पर कार्रवाई नहीं की गई. साथ ही मुकुल राय को पार्टी में शामिल करना तो गलत है ही इसकी टाइमिंग भी गलत है. पार्टी को बताना चाहिए कि शारदा मामले में आरोपी मुकुल अब कैसे भ्रष्ट नहीं रहे. साथ ही व्यवसाय प्रधान राज्य होने के कारण कुछ असर तो जीएसटी का भी पड़ेगा.मित्रों, फिर भी अंत में मैं गुजरातियों व प्रवासी हिन्दी भाषियों से पूछना चाहूँगा कि उनको विकसित भारत और गुजरात चाहिए या आरक्षण के नाम पर बर्बादी चाहिए. हम जब बचपन में क्रिकेट खेलते थे तब टॉस के समय सिक्का उछालने के समय हमेशा भारत को ही चुनते थे भले ही हर बार टॉस हार जाएं. जिस तरह से हमने २०११ और २०१६ में पश्चिम बंगाल, २०१२ में यूपी, २०१५ में बिहार की जनता को सचेत किया था उसी तरह से गुजरात की जनता को चेताना चाहेंगे कि अगर वो आरक्षण के चक्कर में पड़ेंगे तो गुजरात का भी विकास रूक जाना निश्चित है फिर अब आपको सोचना है भ्रष्टाचार और अपराध से मुक्त होना है या दल दल मे फसना फेसला आपका मत करेगा ! मेने तो अपने विचार प्रेषित किए है
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही )
लेखक - संपादक
विद्रोही आवाज

‘बेईमान लोग मुझसे नाराज हैं’- मोदी , मगर मे कहता हु जनता तुमसे नाराज है मोदी जी – उत्तम विद्रोही


कल एक कार्टूनिस्ट के कार्टून पर मेरी नजर पड़ी तो मुझे ब्लॉग लिखने का विषय मिल गया ! वेसे अभी गुजरात व हिमाचल मे चुनावी माहोल है सोशल मीडिया पर राजनीति का शोर शराबा है ! कांग्रेस हो या भाजपा जेसे दो दिन पूर्व एक ब्लॉग लिखा था ” इस जुबानी जंग की शोर मे असल मुद्दे नदारद है ” आरोप प्रत्यारोप हर पल लग रहे है नेता चाहे विधायक हो सांसद हो या पार्टी के किसी पद पर हर राज्य से अपनी पकड़ की हेसियत से उसे काम पर लगा दिया गया है गुजरात व हिमाचल मे खूब मेहनत भी कर रहे है ! खेर यह कोई नयी बात नही चुनावी समय मे अक्सर ऐसा होता है मगर हमारे देश की जनता ने पिछले लोकसभा चुनाव व उसके बाद से भाजपा कहु या मोदी जी को जो समर्थन जिस विश्वास से दिया वह विश्वास मुझे कुछ हद तक धूमिल होता दिख रहा है आम जनता मे कंही न कंही अंधभक्तो को छोड़ नाराजगी साफ नजर आ रही है ! यह मे दावे से कह सकता हु क्यू की राहुल गांधी के सूरत दोरे मे लोगो का लगाव कांग्रेस की तरफ हो न हो मगर भाजपा से नाराजगी जरूर नजर आ रही है ! कपड़ा बाजार जो सूरत ही नही देश की रीढ़ है यंहा के व्यापारी बरसो से भाजपा से जुड़े थे दूर होते नजर आ रहे है अब मूल विषय पर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा —
मोदी कहते हैं ‘बेईमान लोग मुझसे नाराज हैं’ लेकिन सच ये है कि सारे बेईमान उनके साथ आ रहे हैं, समझौता हो गया है पैराडाइज़ पेपर्स में नाम आने पर बीजेपी सांसद आरके सिन्हा के ‘मौनव्रत’ सिन्हा का नहीं बल्कि ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मौनव्रत है। बहुत हुआ भ्रष्टाचार का वार, अबकी बार मोदी सरकार।” लेकिन पीएम के तमाम वादे धीरे-धीरे जुमले साबित होते चले गए हैं । प्रधानमंत्री के कश्मीर में दिए उस बयान को याद दिलाया जाये जिसमें उन्होंने कहा था ‘ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा’। हिमाचल प्रदेश में एक रैली के दौरा पीएम ने भ्रष्टाचार को लेकर एक और बात कही है कि ‘बेईमान लोग मुझसे नाराज़ हैं वो मुझसे बदला लेना चाहते हैं।’ ” गंगा नहाने से पाप धुलते हैं लेकिन आजकल भाजपा में आने से भ्रष्टाचार धुल रहे हैं”,आलम यह है कि पीएम मोदी बेईमान लोगों से इतना तन्हा महसूस कर रहे हैं कि सुखराम, नारायण राणे और मुकुल रॉय जैसे भ्रष्टाचारियों को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। भाजपा ने मुकुल रॉय को शामिल करके शारदा चिटफण्ड के 17 लाख पीड़ित लोगों के साथ दगाबाजी की है। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी के लेकर बीजेपी के नजरिए को भी साफ करता है. भ्रष्टाचार का मामला अगर पुराना हो. मौसम अगर चुनावी हो. नेता अगर वोटजुटाऊ हो तो जो बीत गई सो बात गई कहकर उसे अपने घाट का पानी पीने के लिए बुलाया जा सकता है. भ्रष्टाचारी अगर वोटवैंक वाला हो तो उसके अतीत पर गंगाजल से पोछा मारकर अपने पाले मे लिया जा सकता है। जो बीत गई सो बात गई वाले तर्क के साथ. कविता की ही अगली लाइन जोड़ दें तो कह सकते है ‘जो बीत गई सो बात गई, माना वो बेहद भ्रष्टाचारी था दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी दरिया बन चुकी है तो दरियादिली दिखाने का अधिकार तो है ही. जो भी इस दरिया में आएगा, अपने आप पाक साफ हो जाएगा. गंगा नहाने से पाप धुलते हैं न. तो बीजेपी में आने से भी धुल सकते हैं। भ्रष्टाचार पर ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा’ कहने वाले पीएम मोदी जनता के साथ धोखा कर रहे हैं। उन्हें ऐसे नारे देने का क्या अधिकार है? क्या पीएम के जुमले पर जनता उन्हे कठघरे में खड़ी नहीं कर सकती? प्रधानमंत्री और बीजेपी ने अपने सिद्धांतों से कैसे समझौता कर लिया? जनता से है कि उनके सामने देश में यह सब चीज़े हो रही है लेकिन जनता को कोई हैरत नहीं हो रही है ! 2014 की एक रैली में नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि “क्या ईमानदारी से राजनीति नहीं हो सकती है क्या’? लेकिन सुखराम, नारायण राणे और मुकुल रॉय को बीजेपी में शामिल करके पीएम ने खुद ही अपनी बात को जुमला साबित किया है। 2004 में डीपी यादव के बीजेपी में शामिल होने पर कैसे पार्टी को अाडवाणी और सुषमा स्वराज की नाराज़गी झेलनी पड़ी थी और डीपी यादव को बीजेपी में शामिल नहीं किया गया और 2012 में बीएसपी नेता बाबू सिंह कुशवाहा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। उन्होंने कहा कि सवाल उस शोर के ना उठने का है जो ऐसे मौकों पर उठा करते थे पार्टी के भीतर से मीडिया से और समाज से। मेरा देश वाकई बदल रहा है जहाँ आक्रोश असल मुद्दों पर नहीं है । मे कोई ज्योतिष नही मगर इतना जरूर महसूस कर रहा हु गुजरात मे भाजपा को सीटो का नुकसान होना ही है ओर भाजपा की यह जुमले बाजी नही रुकी तो अगले चुनावो मे जिस रफ्तार से सफलता मिली उसी रफ्तार से …….. हार होना ही है
लेखक – उत्तम जैन ( विद्रोही )
प्रधान संपादक – विद्रोही आवाज
उपरोक्त विचार लेखक के स्वतंत्र विचार है सभी सहमत हो जरूरी नही

Wednesday, 8 November 2017

अलका लांबा पर पत्थर से हमला - राजनीति मे नारी का अपमान व हमले क्यू नारी चुभती हैं ?



अलका लांबा जाना पहचाना नाम है ! जो ट्विटर पर सदेव सक्रिय रहती है आम आदमी पार्टी से जुड़ी ओर विधायिका भी है ! मगर मेने बहुत बार देखा ट्विटर पर बुद्धिजीवी न जाने अपमान जनक शब्दो के कोमेंट्स मे नवाजते है पढ़कर मन मसोस कर रह जाता हु ! ऐसा क्यू ?
 दो वर्ष पूर्व मेरे समाचार पत्र विद्रोही आवाज   के वार्षिक उत्त्सव मे अलका जी मुख्य अतिथि के रूप मे उपस्थित रही थी ! स्वभाव से मित्तभाषी व राजनीति मे तन मन से सक्रिय है  हर  समस्या को अच्छे से सरकार व जनता के सामने सक्रियता लाती है हाल ही जब एक चुनावी सभा में ”आप”नेता अलका लम्बा पर पत्थर से हमला ,कोई नई बात नहीं है .राजनीति के क्षेत्र में उतरने वाली महिलाएं आये दिन कभी शब्द भेदी बाणों का तो कभी पत्थरों आदि के हमलों का शिकार होती रहती हैं .ममता बनर्जी तो पश्चिमी बंगाल में इसका जीता-जागता उदाहरण हैं और देश की प्रथम महिला व् पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी तो इस क्षेत्र में किंवदंती बन चुकी हैं .ममता बनर्जी के बढ़ते वर्चस्व को देखकर वामपंथियों का ख़ौफ़ग्रस्त होना सब जानते हैं क्योंकि इसी खौफ के चलते उन्होंने अपनी सत्ता जाते देख ममता बनर्जी को मरवाने की कोशिश तक कर डाली थी और रही इंदिरा गाँधी जी की बात उन्हें देख तो उनके विपक्षियों की रूहें उनके जीते-जी भी कांपती थी ही उनके मरने के बाद भी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया हैं ! आज भी उनके नाम से सभी विपक्षियों के शरीर में कंपकपी दौड़ जाती हैं और इसलिए आज भी कोई भी चुनाव हो या देश में कोई भी नवीन शुरुआत इंदिरा गाँधी का नाम ले विपक्षी दल उनकी नियत व् चरित्र पर हमले कर इंदिरा गाँधी को चाहने वाली जनता को उनसे तोड़ने की कोशिश करते रहते हैं जबकि आज भी जनता में उनके लिए इतना प्यार हैं जिसके दम पर वर्तमान कॉंग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी ने कॉंग्रेस के विपक्षी दलों को विदेशी होने का विरोध झेलते हुए भी सत्ता से दस साल बाहर रखा राजनीति ही क्या नारी का किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ना पुरुष सत्तात्मक समाज को पसंद नहीं आता हैं और कैसे भी कर नारी को पीछे धकेलने के प्रयास किये जाते हैं और इसमें सबसे बड़ा हमला नारी के चरित्र को लेकर किया जाता हैं ! आये दिन फेसबूक व शोशल मीडिया पर अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी पर विदेशी नारी , बार बाला जेसे पोस्ट जब भी पढ़ता हु मन मे बड़ी ग्लानि होती है ! जहाँ नारी जरा सा आगे बढ़ी वहां सबसे पहले उसको चरित्रहीन कहना आम बात हैं इंदिरा गाँधी पर हमलों में एक बात यह भी हैं कि विपक्षी दल उनके चरित्र पर हमले बोलने से पीछे नहीं रहते ,सोनिया गाँधी के चरित्र को लेकर भी उँगलियाँ उठाई जाती रही हैं ,लेकिन उन्होंने ”एक चुप सौ को हरावे ”का अनुसरण कर विपक्षियों को अनर्गल प्रलापियों की श्रेणी में रहने को छोड़ दिया ,मायावती हो या जयललिता ,उमा भारती हों या सुषमा स्वराज महिलाओं को कहीं भी हों छोड़ा नहीं जाता और जहाँ चरित्र पर हमले से इनका काम नहीं चलता वहां ये जान लेने से भी नहीं चूकते गौरी लंकेश इसका बिलकुल नवीन उदाहरण हैं .!
महिलाओं की तरक्की पुरुष वर्ग को बिलकुल पसंद नहीं आती और अगर इनकी चालबाजियों से बचकर कोई महिला किसी तरह तरक्की कर ले तो इसमें उसके महिला होने को भी फायदे में गिना जाता हैं जबकि यह महिला होना ही तो उसकी तरक्की की सबसे बड़ी बाधा हैं न वह महिला होती न उसके साथ इतनी दिक्कतें होती.पहले तो पैदा होने में दिक्कत दूसरे पढ़ने में दिक्कत ,तीसरे शादी में ,समाज में अपना स्थान बनाने में दिक्कत ,पुरुष वर्ग की यह सोच ”जब तक लड़की की शादी न हो जाये वह धरती पर बोझ हैं और शादी चाहे लड़की हर तरह से काबिल हो उसकी शादी में खूब सारा दहेज़ ,अपने से कम योग्यता वाले पुरुष से शादी और उस पर भी उसे उसकी गुलामी करनी होगी क्योंकि वह नारी हैं और वह पुरुष !
ऐसे में जब कोई नारी आगे बढ़ती हैं तब उस पर हमले होना कोई बड़ी बात नहीं हैं .राजनीति हमारे यहाँ सर्वाधिक प्रभावशाली क्षेत्र हैं और उसमे नारी का स्थान बनाना बहुत बड़ी बात हैं तो पुरुष वर्ग को कैसे पसंद आ सकती हैं लेकिन मुश्किलों को पछाड़ना नारी जाति के लिए भी कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि मुश्किलें तो उसकी आदत में शुमार हो चुकी हैं और मुश्किलें न हों तो उसके पेट में रोटी पचती भी नहीं और इसी का परिणाम हैं कि लाख हमलों के बाद भी नारी हर जगह डटी हुई हैं और निरंतर आगे बढ़ती जा रही हैं
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही ) 
संपादक - विद्रोही आवाज 
मो -84607 83401 

Monday, 6 November 2017

इस जुबानी जंग की शोर में असल मुद्दे जैसे नदारद हो गए हैं. क्या भाषणबाज़ी से हासिल होगा सिंहासन ?

गुजरात व हिमाचल चुनाव घोषणा के साथ हि कांग्रेस और भाजपा में जुबानी जंग चल रही है. गुजरात से लेकर हिमाचल तक दोनों पार्टी के नेता एक दूसरे पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं. इस जुबानी जंग की कमान नरेन्द्र मोदी और राहुल गाँधी ने संभाल रखी है. जिसको देखकर यही लगता है कि वर्तमान दौर में जुबानी जंग के बगैर सियासत की कल्पना नहीं हो सकती. एक दूसरे को नीचा दिखाए जाने के इस चलन में भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. एक चुनावी सभा में मोदी ने कांग्रेस पर एक बार फिर करारा वार करते हुए उसे दीमक बताया है. पीएम मोदी ने हिमाचल में भाजपा के लिए तीन-चौथाई बहुमत की मांग करते हुए, कांग्रेस की तुलना दीमक से की और कहा कि इस दीमक का पूरी तरह सफाया करने की जरूरत है. दूसरी तरफ राहुल गांधी भी कभी गुजरात में विकास को पागल बता रहे हैं तो मोदी सरकार के निर्णायक कदम जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स.
एक जनसभा में मोदी ने कांग्रेस सरकार द्वारा देवभूमि में पांच दानवों को पनपने देने का आरोप लगाया था. प्रधानमंत्री ने खनन माफिया,वन माफिया,ड्रग माफिया,टेंडर माफिया और ट्रांसफर माफिया को देवभूमि का दानव करार दिया था. विधानसभा चुनाव की तारीख के ऐलान के साथ ही प्रदेश में रैलियों व सभाओ का सिलसिला रफ्तार पकड़ने लगा है.! हिमाचल व गुजरात में इस वक़्त वैसे तो मौसम सर्द है पर राजनीतिक पारा बिल्कुल चढ़ा हुआ है. जो मुकाबला मोदी और वीरभद्र का दिख रहा था वो फिर से हर हिमाचल विधानसभा चुनाव की तर्ज़ पर वीरभद्र बनाम धूमल हो गया. वर्ष 1998 से ही इन्हीं दोनों नेताओं के बीच शह और मात का खेल चल रहा है.पहले हुए चार मुकाबले 2-2 से टाई रहा है. मतलब दो बार वीरभद्र तो इतनी ही बार धूमल को सूबे की तख्त पर काबिज़ होने का अवसर मिला है.
पिछले 3 चुनाव में देखें तो हर बार सत्ता बदलने का ट्रेंड रहा है. साल 2003 में राज्य की 68 विधानसभा सीटों में भाजपा को 16 तो कांग्रेस को 43 सीट मिली थी. वहीं 2007 में भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ 41 सीट हासिल किए थे तो कांग्रेस को 23 सीट से संतोष करना पड़ा था. वर्ष 2012 में कांग्रेस को 36 तो भाजपा को 26 सीटें मिली थी. हिमाचल के जातिय समीकरण पर गौर करें तो यहां राजपूत 37.5%, ब्राह्मण 18%, दलित 26.5%, गढ़ी 1.5% और अन्य 16.5% मौजूद हैं. प्रदेश में वीरभद्र पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और पार्टी की लगातार गिरती साख कांग्रेस के लिए मुश्किलें पैदा करने वाला है. इसके अलावा भाजपा के लिए नोटबंदी और जीएसटी पर लोगों को कन्वेंस करना एक चुनौती होगी.
बहरहाल जैसे-जैसे चुनावी तारीख नजदीक आ रही है, वैसे इस सर्द प्रदेश का माहौल गर्म होता जा रहा है. वैसे 9 नवंबर के दिन इतिहास के नजरिये से इस प्रदेश के लिए काफी महत्वपूर्ण है. लगभग 114 साल पहले इसी दिन पहली रेलगाड़ी शिमला पहुंची थी. ऐसे में देवभूमि हिमाचल में किसकी गाड़ी ट्रैक पर रफ्तार के साथ बढ़ते हुए मंज़िल को पाती है और कौन इंजन की भाप की तरह हवा हो जाता है ये 18 दिसंबर को पता चलेगा. अगर गुजरात के चुनावो पर नजर डाले तो गुजरात चुनाव मोदी जी व भाजपा के लिए विशेष महत्व रखता है ! मोदी जी के गृह प्रदेश मे भाजपा की सरकार तो बनना निश्चित है मगर पाटीदार आंदोलन , दलित आंदोलन , व जीएसटी से परेशान व्यापारी वर्ग का इस चुनाव पर असर कंही न कंही सीटो का नुकसान जरूर करेगा ! कांग्रेस व कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पूरे दमखम से गुजरात मे ज़ोर लगा रहै है आरोप प्रत्यारोप की राजनीति सक्रिय हो गयी है ! भाजपा द्वारा अहमद पटेल के ट्रस्ट को लेकर भी विवाद चुनावी माहोल मे सक्रियता से लगा भाजपा व कांग्रेस शोशल मीडिया पर भी सक्रिय हो गयी है ! आम आदमी पार्टी भी कुछ सीटो से भाग्य आजमाने जा रही है अब कितनी सीट मिलेगी यह तो कह नही सकते मगर चुनावी समीकरण जरूर बिगड़ने की आशंका जरूर प्रबल होती है ! लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाषणबाज़ी से हासिल होगा सिंहासन और इस जुबानी जंग की शोर में असल मुद्दे जैसे नदारद हो गए हैं.! फिर जनता इसी भाषणबाजी की शोर मे उलझ कर रह जाएगी ! विकास के सुनहरे सपनों मे खो जाएगी ! अब हमे देखना है अब इस चुनावी समर मे जीत का जश्न कोण मनाता है 18 दिसंबर तक हमे इंतजार करना है मगर गुजरात की आम जनता से एक अनुरोध करना चाहूँगा अपना अमूल्य वोट पार्टी को नही व्यक्ति को देखकर दे !
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही )
उपरोक्त विचार लेखक के स्वतंत्र विचार है 

Sunday, 15 October 2017

जैन संतों पर लगते आरोप ---- एक मंथन का समय है जैन समाज के लिए ..... भाग 1

मे जैन हु ओर जैन समाज मे जन्म लेना मेरे लिए बड़े गर्व की बात है ! आज अगर देखा जाए जैन समाज अल्पसंख्यक होते हुए भी हर तरह से समृद्ध है ! सामाजिक जागृति , आर्थिक , शेक्षणिक , सेवा भावना , परोपकार , दया , अहिंसा , गो सेवा , देशहित के हर कार्यो मे जैन समाज ने अपना परचम लहराया है ! भगवान महावीर के सिदान्तो का अनुगामी जैन समाज एक मच्छर मारने से पहले सो बार सोचता है यह तो छोड़िए अपनी वाणी द्वारा किसी का मन दुखे उसे भी जैन समाज हिंसा मानता है ! जैन समाज की उत्त्पती कब हुई केसे हुई स्पष्ट जानकारी तो मुझे नही मगर जैन कुल मे जन्म लेना ओर जैन धर्म के सिदान्तो का अनुसरण करने मात्र से ज्ञात होता है की इस धर्म मे सूक्ष्म से सूक्ष्म रूप से हर विषय आचार ,विचार को ध्यान मे रखते हुए धर्म की स्थापना हुई होगी ! जैन समाज मे साधू संतो की चर्या सबसे कठोर होती है ! इस चर्या मे जैन समाज की ओर देखा जाये तो जैन धर्म के सिद्धान्त—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य से अभिप्रेरित है। स्याद्वाद, अनेकान्त, सप्तभंगीवाद जैसे सिद्धान्त या शैलियाँ हमारी वैचारिक दृष्टि—सरणि को संतुलित बनाते हैं और मानसिक एवं वाचनिक अहिंसा को मजबूत करते हैं। मगर आधुनिक युग जिसे हम २१वीं सदी कहते हैं उसमें जैनधर्म नए युग का धर्म बनने की ओर अग्रसर है क्योंकि आज का समाज परीक्षण के बिना कुछ भी मानने के लिए तैयार नहीं। उसे जो भी चाहिए वह सारभूत, सर्वाधिक सार्थक और सत्य से संपृक्त होना चाहिए। जैन धर्म के लिए अंतर में विद्यमान आत्मसत्य ही परमसत्य है। यह किसी भी जीव को आलोकित कर सकता है। आत्मसाक्षात्कार आत्मा को स्वयं करना होता है। इसके जो कारण हैं वे हैं साधना, चित्त—शुद्धि और आत्मावलोकन। हमारा धर्म श्रद्धा, ज्ञान और चरित्र प्रधान है। जैन समाज का मूल धार्मिक आधार तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित जैनधर्म एवं दर्शन है। यह धर्म एवं दर्शन सार्वभौमिक सहअस्तित्व पर विश्वास रखता है। यह लोक के भले के लिए है किसी तंत्र विशेष के लिए नहीं। वह ‘मत’ के आधार पर विभाजित या विलोपित नहीं किया जा सकता। यहाँ सत्य का आग्रह है किन्तु दुराग्रह नहीं। विजय अर्थात् जीतने के लिए आत्मा है किन्तु प्राणियों से शत्रुता नहीं। यदि शत्रु भी कोई हैं तो वे विभाव हैं, राग—द्वेष हैं। यह स्वयं को जीतने का दर्शन है। यदि आप अपने कल्याण के पक्षधर हैं तो बने रहें; कहीं कोई आपत्ति नहीं, किन्तु ध्यान रहे दूसरों का अहित आपसे न हो; इस बात का ख्याल रहे। यह अन्त:बाह्य स्वरूप में एकत्व चाहता है। वरना तो स्थिति यह है कि— बड़ी भूल की चित्रों को व्यक्तित्व समझ बैठे। अब मे मूल विषय पर अपना ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा ! यह विषय है ... एक मंथन का समय है जैन समाज के लिए ... यह विषय ओर इस पर मुझे लिखने को मेरे मन ने क्यू कहा ?
स्पष्ट है वर्तमान की परिस्थिति को देखते हुए मेरे अन्तर्मन मे एक जिज्ञासा उत्त्पन हुई हमारा समाज समृद्ध होते हुए क्यू दिशाहीन हो रहा है! एक कटु सत्य कहु जैन समाज ने सदेव अपने अपने पंथो व संप्रदाय को महत्व देते हुए हमेशा अपना अपना राग अलापा है ! कभी कभी दर्द होता है एक संप्रदाय के होते हुए भी अपने अपने आचार्यो के बखान करने के लिए दूसरे आचार्यो व साधू संतों को नीचा दिखाने के लिए न जाने किस तरह के आक्षेप लगाए है ओर एक ऐसा माहोल बनाया की उसमे बदनाम हुआ तो पूरा जैन समाज ! आपको एक बात साफ कर दु मे श्वेतांबर संप्रदाय के तेरापंथ धर्मसंघ से जुड़ा हु ! तेरापंथ धर्मसंघ आचार्य भिक्षु के समय से अस्तित्व मे आया मगर आचार्य भिक्षु ने शायद 258 वर्ष की स्थापना का उदेश्य साधारण था ! कुछ वेचारिक मतभेद इस विषय पर मे ज्यादा चर्चा नही करूंगा ! मगर आज जैन समाज के सभी संप्रदाय व घटको को देखा जाए तो सिर्फ श्वेतांबर तेरापंथ धर्म संघ ही एक ऐसा संघ है जंहा एक आचार्य होते है ... ओर उस धर्म संघ का एक ही घोष है एक गुरु एक विधान ... मे तेरापंथी हु इसका अर्थ यह नही की मेे अपने धर्मसंघ का बखान कर रहा हु मगर एक विचारणीय व मननीय विषय है की क्यू आज हर साधू संत जिसके संघ मे साधू संतों की संख्या इक्का दुक्का हो आचार्य पद पर सुशोभित होकर अपनी अपनी अलग अलग विचारधारा को जन्म देते है मेरा अभिप्राय उन संतों व आचार्यो का अपमान करना नही है मगर जब संतों ने सर्वश्व त्याग कर संयम धर्म को अपना लिया तो क्यू पद व मान मर्यादा के लिए अपने अपने राग अलापते है ! खेर इस विषय पर ज्यादा लिखना मेरे लिए हितकर नही होगा मगर हम जैन धर्म के श्रावक के लिए समय है हमे मंथन करना होगा ! हम श्रावक सबसे बड़े दोषी है हम अपने गुरु व साधू संतों की चर्या मे जो दोष लग रहा है ! हम क्यू नही अपने गुरु व साधू संतों के जिन चर्या जो धरम के सिदान्तो के अनुरूप नही है उन्हे उन चर्या को करने से रोकते है ! कारण स्पष्ट है हम अपने धर्म गुरु के मुखारवृन्द से अपने तारीफ सुनने के आदि हो चुके है ! जिससे हमे गर्व हो ओर समाज मे मान सन्मान मिले .... मगर मे एक साधारण सा पत्रकार व लेखक आपके विचारो की आलोचना करता हु ! आपने स्वयं के हित के लिए समाज की मान मर्यादा को दाव पर लगा दिया है ! हम जैन है ओर भगवान महावीर के बताए मार्ग का अनुसरण करना है तो गुरु , साधू , संत , आचार्यो का सन्मान करते हुए उनके अच्छे कार्यो मे सहमति दे ओर हमे लगे की हमारे साधू संत आचार्य हमे अपने निजी स्वार्थ के कारण भ्रमित कर रहे है तो विरोध करे ! तो न सूरत मे आचार्य शांति सागर जी पर जेसे आरोप लगे इस तरह के आरोपो का हमे सामना करना पड़ेगा न ही हमारे सम्पूर्ण जैन समाज की बदनामी होगी ! हमे स्वयं संयमित जीवन जीते हुए साधू संतों को संयमित जीवन मे रहने की ओर प्रेरित करेंगे ! मेरे इन शब्दो से आपको जरूर कष्ट होगा की हम हमारे समाज मे संतों को संयमित रहने के लिए केसे प्रेरित करे मगर सच यही है साधू संतों की चर्या मे दोषी सबसे ज्यादा दोषी हमारा समाज , मे व आप ही है ! जो सिर्फ साधू संतों व आचार्यो की नजर मे बड़ा बनने के लिए उनकी चर्या मे दोषी बनते है .... आगे अगले अंक मे ....
आपका -
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही )        

Thursday, 5 October 2017

मेरे मन की बात - स्वच्छ भारत अभियान एक बड़ी चुनौती 2019 तक क्या मोदी जी का सपना साकार होगा

आज उधना स्टेशन से मेरे ऑफिस के लिए  निकल रहा था किसी काम से एक गली से निकला एक महानगर पालिका द्वारा संचालित एक शोचालय की तरफ नजर पड़ी अपनी दुपहिया गाड़ी वहा रोकी ओर निहारने लगा   जिसके बाहर एक बड़ा स्लोगन लिखा था - "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ  -बिन शोचालय के दुल्हन का शृगार  अधूरा है " साथ मे बहुत से स्लोगन लिखे हुए थे ! सभी स्लोगन पढे अच्छे भी लगे विचार किया क्यू नही अंदर जाकर स्वच्छता को भी निहार आऊ ! अंदर जाने लगा एक बिहारी बाबू ने शायद कोंटरेक्ट लिया हुआ है उसने शायद सोचा ने शोच के लिए आया हु ! मेने अपना बिना परिचय दिये वंहा सामने दीवार पर रेट लिखी हुई थी नहाने का 5 रुपया शोच का 2 रुपया जो साफ साफ नही दिख रहे थे ! ज्यादा पेसे लेने के लिए शायद रुपये जो लिखे हुए थे हल्के से मिटा दिये गए जिससे साफ न दिखाई दे ! मेने जेब से 2 का सिक्का निकाल कर दिया उक्त ठेकेदार या ठेकेदार का कर्मचारी होगा 3 रुपया मांगने लगा ! जब मेने उसे कहा निश्चित शुल्क तो 2 रुपया है फिर ज्यादा वसूली क्यू ? शायद उसे कुछ भनक लग गयी मुझसे उलझा तो नही अंदर जाकर देखा कुछ के दरवाजे टूटे है तो बहुत  जगह पान मावे व गुटके की पीक मारी हुई है ओर इतनी बदबू की ज्यादा देर हम खड़े भी नही रह सकते !  सरकार द्वारा चलायी जा रही स्वच्छ भारत ओर जगह जगह  शोचालय की परिकल्पना लेकर वंहा से निकला ओर एक ब्लॉग लिखने का विषय मिल गया ---- 
           हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी  ने प्रधानमंत्री पद की शपथ के साथ ही एक बहुत बड़ा मिशन हाथ मे लिया  "स्वच्छ भारत " निसंदेह मोदी जी द्वारा यह शुरू किया  मिशन प्रसंशनीय भी था ! खेर सफलता के किस शिखर पर हम पहुंचे कोई स्पष्ट आंकड़े तो  नही मगर देखा जाये तो   देश को स्वच्छ बनाने के प्रधानमंत्री मोदी के संकल्प की समय-सीमा ज्यों-ज्यों समीप आती जा रही है, राज्यों और उनके प्रशासन पर यह लक्ष्य हासिल करने का दबाव बढ़ता जा रहा है. 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने आह्वान किया था कि 2019 तक पूरे देश को साफ-सुथरा बनाना है. खुद उन्होंने दिल्ली की एक सड़क पर झाड़ू लगाकर स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी. उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों और भाजपाई राज्यों के मुख्यमंत्रियों एवं मंत्रियों ने भी झाड़ू पकड़कर स्वच्छता का संकल्प लिया था. जो हमे आए दिन इलेक्ट्रोनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया मे दिखाई देता था !  
इसमें दो राय नहीं कि स्वच्छ भारत मिशन अत्यंत आवश्यक और पवित्र संकल्प है. गांवों से लेकर शहरों तक भीषण गंदगी फैली है. पीने का साफ पानी स्वच्छ होना तो बहुत दूर की बात है, कूड़े-कचरे, मलबे और मानव उच्छिष्ठ के कारण गांवों से लेकर शहरों-महानगरों तक की आबादी घातक रोगों की चपेट में आती रहती है.  जिनसे हर साल सैकड़ों-हजारों बच्चों की मौत होती है, इन बीमारियों के होने और फैलने का प्रमुख कारण गंदगी है. पूर्व की कांग्रेस सरकारों और यूपीए शासन में निर्मल भारत योजना चलायी जरूर गयी, लेकिन किसी प्रधानमंत्री ने इस अभियान को ऐसी प्राथमिकता और इतना ध्यान नहीं दिया जितना ध्यान मोदी सरकार ने प्राथमिकता से दिया ! 
प्राप्त सरकारी आंकड़ों (नेट से प्राप्त ) पर विश्वास करें, तो देश का सफाई-प्रसार (सैनिटेशन कवरेज) जो 2012-13 में 38.64 फीसदी था, वह 2016-17 में 60.53 फीसदी है. 2014 से अब तक करीब तीन करोड़ 88 लाख शौचालय बनवाये गये हैं.  
एक लाख 80 हजार गांव, 130 जिले और तीन राज्य- सिक्किम, हिमाचल और केरल- खुले में शौच मुक्त घोषित कर दिये गये हैं. दावा है कि इस वर्ष के अंत तक गुजरात, हरियाणा, पंजाब, मिजोरम और उत्तराखंड भी इस श्रेणी में आ जायेंगे. 
 
जमीनी हकीकत बहुत फर्क है. देश में शायद ही ऐसा कोई नगर निगम, नगर पालिका या पंचायत हो, जिसके पास अपने क्षेत्र में रोजाना निकलने वाले कचरे को उठाने और कायदे से उसे निपटाने की क्षमता हो. जो कचरा उठाया जाता है, किसी बाहरी इलाके में उसका पहाड़ बनता जाता है. सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा कायम है. खुले में शौच की मजबूरी का नारकीय उदाहरण तो रोज सुबह ट्रेन की पटरियों, खेतों-मैदानों में दिखाई ही देता है.
 
प्रधानमंत्री और सारे मंत्री चाहे जितना झाड़ू उठा लें, कचरा प्रबंधन और नगर निगमों-नगर पालिकाओं की क्षमता बढ़ाये बिना शहर और कस्बे साफ नहीं हो सकते. नागरिकों को सफाई अपने व्यवहार का हिस्सा बनानी होगी. इन मोर्चों पर क्या हो रहा है?
 
स्वच्छ भारत मिशन का सारा जोर खुले में शौच को बंद करना है. जिलाधिकारियों पर अपने जिले को इससे मुक्त घोषित करने का दबाव है. उसी दबाव के चलते अभी अभी कुछ दिनो पूर्व सुना है जिलाधिकारी के आदेश  लुंगी खुलवाई जा रही है, कहीं टॉर्च चमकाया जा रहा है और कहीं भारी जुर्माना थोपा जा रहा है. ! 
 
क्या ऐसे अपमान और आतंक से लोगों को समझाया जा सकता है? स्वच्छ भारत मिशन की दिशा-निर्देशिका कहती है कि गांव-गांव स्वच्छता-दूत तैनात किये जायें, जो लोगों को समझायें कि खुले में शौच के क्या-क्या नुकसान हैं. लोगों को समझाना है, न की अपमानित करना ! 
बहुत सारे लोग शौचालय बनवा लेने के बावजूद खुले में जाना पसंद करते हैं. पुरानी आदत के अलावा ऐसा शौचालयों की दोषपूर्ण बनावट के कारण भी है. हमे यदा कदा शोशल मीडिया पर सरकार या पालिका द्वारा बनवाये शोचालय मे पान की दुकान तो कंही किराने की दुकान के फोटो भी प्राप्त हुए ! 
सरकारी दबाव और मदद से जो शौचालय बनवाये गये हैं, अधिसंख्य में पानी की आपूर्ति नहीं है. ‘सोकपिट’ वाले शौचालयों में पानी कम इस्तेमाल करने की बाध्यता भी है. नतीजतन दड़बेनुमा ये शौचालय गंधाते रहते हैं. ‘कपार्ट’ के सोशल ऑडिटर की हैसियत से मैंने देखा है कि लोग ऐसे शौचालयों का प्रयोग करना ही नहीं चाहते. बल्कि, उनमें उपले, चारा और दूसरे सामान रखने लगते हैं. 
 
एक बड़ी आबादी शौचालय नहीं बनवा सकती, क्योंकि उसके लिए दो जून की रोटी जुटाना ही मुश्किल है. गंगा के तटवर्ती गांवों को खुले में शौच-मुक्त कर लेने के सरकारी दावे की पड़ताल में एक सर्वे  मे हाल ही में पाया कि लगभग सभी गांवों में ऐसे अत्यंत गरीब लोग, जिनमें दलितों की संख्या सबसे ज्यादा है, अब भी खुले में शौच जा रहे हैं. वे शौचालय बनवा पाने की हैसियत ही में नहीं हैं. सरकारी सहायता तब मिलती है, जब शौचालय बनवाकर उसके सामने फोटो खिंचवायी जाये.  
शहरों-महानगरों में एक बड़ी आबादी झुग्गी-झोपड़ियों में रहती है. मजदूरी करनेवाले एक बोरे में अपनी गृहस्थी पेड़ों-खंभों में बांधकर फुटपाथ या खुले बरामदों में जीते हैं. इनके लिए सामुदायिक शौचालय बनवाने के निर्देश हैं. अगर वे कहीं बने भी हों, तो उनमें रख-रखाव-सफाई के लिए शुल्क लेने की व्यवस्था है, जो इस आबादी को बहुत महंगा और अनावश्यक लगता है. 
खुले में शौच से मुक्ति का अभियान सचमुच बहुत बड़ी चुनौती है. इसका गहरा रिश्ता अशिक्षा और गरीबी से है. सार्थक शिक्षा दिये और गरीबी दूर किये बिना सजा की तरह इसे लागू करना सरकारी लक्ष्य तो पूरा कर देगा, लेकिन सफलता की गारंटी नहीं दे सकता. आज सरकार के साथ आम जनता को इस अभियान के लिए जागृत होना होगा ! 
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही ) 

Sunday, 1 October 2017

गांधी जयंती पर विशेष - मेरे मन की बात

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आज 148वीं जयंती है. आज सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बापू के समाधि स्थल राजघाट जाकर श्रद्धांजलि दी. इस के साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने भी महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी. राष्ट्रपति रामनाथ कोलिंद और उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू में भी महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी. प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर महात्मा गांधी को याद किया. उन्होंने लिखा, ”गांधी जयंती पर बापू को शत्-शत् नमन! मैं गांधी जयंती पर प्रिय बापू को नमन करता हूं. उनके महान आदर्श दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रेरित करते हैं.
आज पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शात्री की भी 113वीं जयंती है. पूरा देश धूमधाम से गांधी-शांस्त्री जयंती मना रहा है. प्रधानमंत्री मोदी ने लालबहादुर शास्त्री को भी याद किया. उन्होंने लिखा, ”जवानों एवं किसानों के प्रणेता एवं देश को कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाले शास्त्री जी को नमन!” 
वेसे गांधी जयंती या  लालबहादुर शास्त्री जयंती हो या कोई भी जयंती एक परंपरा है उन्हे याद करने की ओर श्रद्धांजलि अर्पित करने की मगर हमे सोचना यह है  पूरे विश्व में हिंसा का दौर बढ़ता जा रहा और जितना यह बढ़ेगा उतनी ही बढ़ेगी गांधी जी की अहिंसा सिद्धांत की प्रासंगिकता बढ़ेगी । महात्मा गांधी ने भारत को आजादी दिलाई यह कहना कुछ अतिश्योक्ति मानते हैं तो कुछ लोग महात्मा गांधी को अप्रासंगिक सिद्ध करने के लिये हिंसा का समर्थन भी करते हैं। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन दौरान  भी एक वर्ग हिंसा का समर्थक   तो दूसरा उदारवादी था जो महात्मा गांधी  के साथ रहा। मगर यह दोनों ही प्रकार के वर्गों के प्रसिद्ध नाम  घूमते उसी आजादी के आंदोलन के एतिहासिक घेरे में ही हैं जिसका शीर्षक महात्मा गांधी के नाम से लिखा जाता है। इसी आंदोलन के कुछ नेताओं और शहीदों के नाम से कुछ अन्य लोग विचारधारायें चला रहे हैं। इतना ही नहीं भारतीय अध्यात्म ज्ञान तो उनके लिये पुराना पड़ चुका है और उसका अब कोई महत्व नहीं है। जहां तक अध्यात्मवादियों  का सवाल है वह वह भारत को न तो कभी  गुलाम हुआ मानते हैं न ही केवल राजनीतिक आजादी  का उनके लिए कभी महत्व रहा है।  उनके लिए यह केवल राजस बुद्धि वालों का  भ्रम है की वह आपसी संघर्षों से समाज को नियंत्रित करने का दावा करते हैं 
जबकि यह कार्य प्रकृति  स्वयं करती है। अगर सही आंकलन करें तो आज के समाज में गरीबी, भ्रष्टाचार, भय, और अपराध के विरुद्ध चलने वाले आंदोलनों को इसी अहिंसा के मार्ग पर चलना चाहिये क्योंकि महात्मा गांधी आज के लोकतांत्रिक समाज में राज्य का विरोध करने के लिये हिंसा के पुराने तरीके हिंसक तख्ता पलट की जगह इसे सही मानते थे। आपने इतिहास में देखा होगा कि अनेक प्रकार के राजा जनता की नाराजगी के कारण हिंसा का शिकार हुए या उनका तख्ता पल्टा गया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय का अवलोकन करें तो उस समय कार्ल मार्क्स  का प्रभाव बढ़ रहा था और उसके चेले व्यवस्था का बदलाव हिंसा के सहारे कर रहे थे जबकि लगभग उसी समय महात्मा गांधी ने आंदोलनों को अहिंसा का मार्ग दिखाया। यही पश्चिम के गोरे लोग चाहते थे पर अंततः उनको भी यह देश छोड़ना पड़ा पर वह छोड़ते हुए इस देश में हिंसा का ऐसा इतिहास छोड़ गये जिससे आज तक यहां के निवासी भुगत रहे है।
               मूल बात यही है कि महात्मा गांधी आधुनिक समाज के संघर्षों में हिंसक की बजाय अहिंसक आंदोलन के प्रणेता थे। उनकी याद भले ही सब करते हों पर हथियारों के पश्चिमी सौदागर और विचारों के पूर्वी विक्रेता उनसे खौफ खाते हैं। गनीमत है पश्चिम वाले एक दिन महात्मा को याद कर अपने पाप का प्रायश्चित करते हैं पर पूर्व के लोग तो हिंसावाद को ही समाज में परिवर्तन का मार्ग मानते हैं। यहां यह भी बता दु कि महात्मा गांधी राज्य चलाने के किसी सिद्धांत के प्रवर्तक नहीं थे क्योंकि उसके लिये आपको सत्ता की राजनीति करनी पड़ती है जिसका आंदोलन की राजनीति से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। इसलिये ही सारी दुनियां की सरकारें महात्मा गांधी को याद करती है ताकि उनके विरुद्ध चलने वाले आंदोलन हिंसक न हों।
              यहा साफ करना चाहूँगा  की हिंसक या अहिसक आंदोलनों से सत्ता या सरकार  बदलना एक अलग बात है पर राज्य को सुचारु तरीके से चलाना एक अलग विषय है। महात्मा गांधी कम से कम इस विषय में कोई ज्ञान नहीं रखते थे। यही कमी उनको एक पूर्ण राजनेता की पदवी देने से रोकती है। हमारा  देश हजारों वर्ष पुराना है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान तो जीवन जीने की ऐसी कला सिखाता है कि पूर्व और पश्चिम दोनों ही उसे नहीं जानते पर अपने ही देश के लोग उसे भूल रहे हैं। दक्षिण एशिया जहां एक नहीं बल्कि तीन तीन अहिंसा के पूजारी और प्रवर्तक हुए वहां हिंसा का ऐसा बोलबाला है जिसकी चर्चा पूरे विश्व में हैं। पाकिस्तान के कबाइली इलाके हों या हमारे पूर्वी हिस्से। 
धार्मिक और राजनीतिक क्रूर सिद्धांतों की जकड़ में हैं। एक बात यकीनी तौर से मानिए कि आज के संदर्भ में कोई भी आंदोलन गरीबों और शोषकों के नाम पर सफल होता है पर किसी का भला हो यह नहीं दिखता। हकीकत तो यह है कि इन आंदोलनों को पैसा भी मिलता है। अब यह पैसा कौन देता है यह अलग से चर्चा का विषय है। इसी पैसे के लिये व्यसायिक आंदोलनकारी किसी विचाराधारा या नारे को गढ़ लेते हैं। अगर वह हिंसा का समर्थन न करें तो शायद उनको वह पैसा न मिले। साफ बात कहें तो इन हिंसक आंदोलनों की आड़ में पैसा देने वाले कुछ न कुछ आर्थिक लाभ उठाते हैं। ऐसे में उनके लिये गांधी का अहिंसा सिद्धांत का धोखे की टट्टी है। तब भी वह अधिक दूर नहीं जाते। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शहीद हुए गरमपंथी महापुरुषों की तस्वीरें लगाकर उनका प्रचार करते हैं। साथ ही गांधी जी की आलोचना करने से उनको कोई गुरेज नहीं है।
              अब एक दूसरी बात यह है कि हम आजादी की बात करते हैं पर आज जब उस आजादी पर चर्चा होती है तो अनेक प्रकार के सवाल भी आते हैं। आखिर गांधी जी किससे आजादी चाहते थे? केवल गोरी चमड़ी से या उनके राज्य से। याद रखिये आज भी इस देश में अंग्रेजों के बनाये हुए कानून चल रहे हैं। इनमें से तो कई ऐसे हैं जो इस समाज को निंयत्रित करने के लिये यहीं के लोगों ने उनको सुझाये होंगे। इनमें एक वैश्यावृत्ति कानून भी है जिसे अनेक सामाजिक विशेषज्ञ हटाने की मांग करते हैं।  उनका मानना है कि यह कथित रूप से कुछ अंग्रेजपरस्त लोगों ने इस बनवाया था ताकि भारत की सामाजिक गतिविधियों को मुक्त रूप से चलने से रोक जा सके।  दुसरा जूआ का भी कानून है। अनेक विद्वान समाज सुधार में सरकारी हस्तक्षेप के विरोधी हैं और वह मानते हैं कि यह सरकार काम नहीं है। अनेक विद्वान समाज सुधार में सरकारी हस्तक्षेप के विरोधी हैं और वह मानते हैं कि यह सरकार काम नहीं है। 
अपराधी रोकना सरकार का काम है न कि समाज के संस्कारों की रक्षा करना उसकी कोई जिम्मेदारी है। कुछ लोग कहते हैं कि वैश्यावृत्ति, जुआ या व्यसनों की प्रवृत्ति पर अंकुश रखना सरकार का काम नहीं बल्कि यह समाज का स्वयं का दायित्व है। कहने का मतलब है कि लोग यही मानते हैं कि समाज स्वयं पर नियंत्रण करे न करे तो वही दायी है। जो आदमी व्यसन या बुरा काम करता है तो अपनी हानि करता हैै। हां जहां वह दूसरे की हानि करता है तो बहुत सारे कानून है जो लगाये जा सकते हैं। लोग तो सतीप्रथा वाले कानून पर सवाल उठाते हैं और पूछते हैं कि उस समय या उससे पहले कितनी स्त्रियां इस देश में सती होती थीं। जिनको होना है तो अब भी इक्का दुक्का तो अब भी घटनायें होती है। वैसे ही अगर किसी स्त्री को जबरन सती कर दिया जाता है तो हत्या का अपराध या वह स्वयं होने के लिये तत्पर होती है तो आत्महत्या का कानून उस पर लग सकता है तब सती प्रथा रोकने के लिये अलग से कानून की जरूरत क्या थी?
                         मुझे तो ऐसा लगता है कि अंग्रेजों की नजरों में बने रहने के लिये अनेक लोगों ने उस समय अनेक प्रकार के सामाजिक सुधार आंदोलन चलाये होंगे। इस तरह समाज में सरकारी हस्तक्षेप की प्रवृत्ति बढ़ी जिसका अनेक सामाजिक विशेषज्ञ विरोध करते रहे हैं। सीधा मतलब यह है कि अंग्रेज चले गये पर अंग्रेजियत छोड़ गये। वह भी इसलिये कि महात्मा गांधी यहां प्रासगिक नहीं रहें। वैसे भी अपने देश में उनको किस प्रसंग में याद किया जाये? हां, इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज के युग में अपनी अभिव्यक्ति या आंदोलन के लिये उनका सिद्धांत अति प्रासंगिक हैं। उनको इसलिये नमन करने का मन करता है।
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही )