Sunday, 5 March 2017

कडवे घूंट जीवन के ---

हमारी वर्तमान दशा व दिशा सिर्फ अपने कारण से होती है इस दशा मे मुख्य कारण एक चिंता व नकारात्मक भाव है !चिंताओं का विश्लेषण किया जाए तो ४०%- भूतकाल की, ५०% भविष्यकाल की तथा १०% वर्त्तमान काल की होती है ! इस स्वीकार भाव से ही हमारे भाव बदलने शुरू होते हैं। रोग का जन्म ही नकारात्मक भावनाओं में है । विकृत भाव व चिन्तन रोग के माता-पिता है । हम भावनाओं में जीते है । उन्हे बदल कर ही हम सुखी हो सकते है । आज अधिकतर लोग चिन्ता से चिन्तित रहते हैं। पिता को अपनी बेटी की शादी की चिन्ता है। एक गृहिणी को पूरा महीना घर चलाने की चिन्ता है। एक विद्यार्थी को अच्छे अंक प्राप्त करने की चिन्ता है। एक मैनेजर को अपने प्रोमोशन की चिन्ता है। एक व्यापारी को अपने व्यापार में लाभ कमाने की चिन्ता है। एक नेता को चुनाव से पहले वोट लेने और जीतने की चिन्ता है। किसी को अपनी सफलता की दावत देने की चिन्ता है।न जाने इंसान कितनी चिंताओ से ग्रसित रहता है लोगों ने जाने-अनजाने में अपनी जिम्मेदारी के साथ चिन्ता को भी जोड़ दिया है। क्या हर जिम्मेदारी के साथ चिन्ता का होना आवश्यक है? क्या चिन्ता किए बिना जिम्मेदारी का निभना संभव नहीं है? एक मां अपने बच्चे से कहती है, 'तुम्हारी परीक्षा सिर पर आ गई है, अब तो चिन्ता कर लो।' बच्चा शायद समझदार है। वह चिन्ता नहीं करता, पढ़ाई करता है और अपनी परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है। जिम्मेदारी है पॉजिटिव और चिन्ता करना है नेगेटिव। हम जब जिम्मेदारी को निभाते हैं तो हमारी ऊर्जा पॉजिटिव काम में लगती है और हमें लाभ देती है। लेकिन जब हम चिन्ता करते हैं तो हमारी ऊर्जा नेगेटिव काम में लगती है और नष्ट हो जाती है। मान लो यदि हमारी 20 प्रतिशत ऊर्जा चिन्ता में चली जाती है तो जिम्मेदारी को निभाने के लिए कितनी बची? यदि साधारण हिसाब की बात करें तो बचती है 80 प्रतिशत। लेकिन यदि हम गहराई में जाएं तो परिणाम कुछ और ही होगा। चिन्ता है नेगेटिव और जिम्मेदारी है पॉजिटिव। जब दोनों एक साथ होंगे तो एक दूसरे की विपरीत दिशा में काम करेंगे। जिस तरह 'टग ऑफ वार' खेल में दो विभिन्न समूह एक मोटे रस्से को दो विपरीत दिशाओं में खींचते हैं तो एक समूह की सामूहिक ऊर्जा, दूसरे समूह की सामूहिक ऊर्जा के साथ बराबर हो जाती है। उसके बाद जिस समूह के पास थोड़ी ऊर्जा ज्यादा बचती है, उसका पलड़ा भारी हो जाता है और वह विजयी घोषित किया जाता है। इसी तरह चिन्ता और जिम्मेदारी के मध्य भी चलता है 'टग ऑफ वार'। यदि 20 प्रतिशत ऊर्जा चिन्ता के पास है तो उसे बराबर करने के लिए 20 प्रतिशत ऊर्जा जिम्मेदारी की ओर से खर्च करनी होगी। इस तरह हमारे पास जिम्मेदारी निभाने के लिए बचती है सिर्फ 60 प्रतिशत ऊर्जा। जितनी ऊर्जा हम लगाएंगे, परिणाम भी वैसे ही आएंगे। 100 प्रतिशत ऊर्जा लगाने के परिणाम अधिक और अच्छे होंगे और 60 प्रतिशत ऊर्जा लगाने के परिणाम कम ही होंगे। लेकिन लोगों को लगता है कि काम चल जाएगा। यदि हमारी 50 प्रतिशत ऊर्जा चली गई चिन्ता की ओर तो चिन्ता शेष 50 प्रतिशत ऊर्जा भी खींच लेगी जिम्मेदारी से। और इस तरह हमारे पास अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए कोई ऊर्जा बचेगी ही नहीं। जब ऊर्जा न हो तो अच्छा से अच्छा उपकरण भी काम नहीं कर पाता। फिर हमारा दिमाग भी बिना ऊर्जा के काम कैसे कर सकता है। हम बहुत छोटी-छोटी जिम्मेदारियां भी नहीं निभा सकते और स्वयं से कहते हैं, 'ये मुझे क्या हो गया है, मेरा दिमाग ही काम नहीं कर रहा।' चिन्ता हमारी ऊर्जा को नष्ट कर देती है, जिससे हम अपनी जिम्मेदारी को निभाने में अपने आप को असमर्थ महसूस करते हैं। हम अपनी जिम्मेदारी से नाता नहीं तोड़ सकते। हमें अपनी जिम्मेदारी को निभाने के लिए ऊर्जा चाहिए। इसलिए यह हमारी सबसे बड़ी जरूरत है कि हम अपनी ऊर्जा को चिन्ता में नष्ट होने से रोकें। हमें चिन्ता न करने का अभ्यास करना है। लेकिन कोई भी अभ्यास करने के लिए आवश्यक है अभ्यास करने का अवसर। प्रतिदिन हमारे पास अनगिनत समस्याएं आती हैं, जिनके लिए हम चिन्ता करते हैं। तो हर समस्या आने पर स्वयं से बात करें कि चिन्ता करने पर मेरी मूल्यवान ऊर्जा नष्ट हो रही है, जो मुझे नहीं करनी। सिर्फ अपने मन को इस बात की याद दिला कर भी हम अपनी काफी ऊर्जा नष्ट होने से बचा सकते हैं।
यदि आप चिन्ता मुक्त होना चाहते है तो आपको सकारात्मक विचारों को अपने जीवन में लाना पड़ेगा । चिन्ता जन्मजात नहीं होती है । ये एक आदत है जो पड़ जाती है । जब हम इस आदत को मजबूत बना लेते है तो इसको तोड़ना मुश्किल पड़ जाता है । यदि हमको पता चल जायें कि चिन्ता से डर का जन्म होता है और डर एक बहुत भयानक वस्तु है जो आपको मुर्त्यु का ग्रास बना सकती है!
उत्तम जैन (विद्रोही )
संपादक - विद्रोही आवाज 
मो -८४६०७८३४०१ 

नारी शक्ति - भूत - वर्तमान व भविष्य

शक्ति की प्रतीक , समानता का अधिकार,कमज़ोर, हर क्षेत्र में आगे इन सभी उपमाओं का प्रयोग समय -समय पर लोग महिलाओं के विवरण देने हेतु विशेषण की तरह प्रयोग करने लगे हैं. जो भी हो यह सत्य है कि आज ही नहीं पूर्व काल से ही महिलाएं किसी भी मायने में पुरुषों से कामजोर नहीं रही है. जिस तरह कोई भी इंसान गुलामी में गौण हो जाता है वह अपनी संस्कृति ही नहीं अपनी क़ाबलियत भी खोने लगता है उसी तरह अंततः लंबे समय के गुलामी के कारण से अपने यहाँ भी लोगों ने महिलाओं को कमजोर बना दिया. मानसिक रूप से भी और शारीरिक तथा आर्थिक रूप से भी पर आजादी जब मिली तो महिलाओं ने पुनः अपना कमाल दिखाना आरम्भ कर दिया और आज विशेषकर भारतीय महिलायें तो हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा चुकी है.जमीन से आसमान तक अपनी सफलता का परचम लहरा रही हैं , आज अपने परिश्रम के बल पर जो मुकाम हासिल किया है वह अभिनन्दनीय है . धैर्य ,कर्मठता ,अथक परिश्रम , बुलन्द इरादों से सर्वत्र सफलता अर्जित कर रही है ,कोई भी क्षेत्र हो शिक्षा जगत हो ,खेल जगत हो ,कला क्षेत्र हो ,विज्ञानं क्षेत्र हो या राजनीतिक गलियारे हर ओर महिला अपने को उच्चतम शिखर पर पहुंचा रही है ,आज की नारी “लाज कि गुड़िया नहीं प्रत्युत पुरुष की सहयोगिनी ,जीवनसंगिनी के रूप में सफलता अर्जित कर रही है .कदम से कदम मिलाकर चलनेवाली नारी के मूलभूत गुण समाप्त नहीं हुए हैं घर ,परिवार ,समाज और देश के लिए समर्पित नारी के बिना यज्ञ भी पूर्ण नहीं होता !मध्यकाल में उसकी दयनीय स्थिति हो गयी थी घर की चारदीवारी में उसे रहना पड़ा ,इस कारण पुरुष से पिछड़ गयी थी .कुछ पुरुष के दुराचार के कारण उसे छिपाना पड़ा ,कैद सदृश जीवनयापन करना पड़ा, मज़बूरीवश .पुरुष के अत्याचारों से शिक्षा से भी वंचित होना पड़ा ,इसलिए भी पिछड़ गयी थी महिलायें ..प्राचीन काल में शक्तिस्वरूपा दुर्गा के रूप में अवतरित हुई थी और उनका अवतरण भी तब हुआ था जब उस समय के सारे पुरुष तक़रीबन हार मान चुके थे . नारी तो इस सृष्टि पर हर रूप में आयी है. वह धनदायिनी ,विद्यादायिनी और जीवनदायिनी है सनशीलता की प्रतिमूर्ति है . एक से एक बढ़कर नारियां इस भारत भूमि पर आयीं !लेकिन अब अपनी क्षमता से ,मेहनत से सफलता का स्वाद चख लिया है !पुनः शक्तिस्वरूपा के रूप में प्रतिष्ठित हो रही है. !
आज नारीयो ने देश के लिए हर क्षेत्र मे अदम्य उत्साह से कदम रखकर एक मिशाल कायम किया है . विरोध का सामना भी करना पड़ा लेकिन अविचल भाव से आगे बढ़ती गयीं. कदम रुके नहीं , थके नहीं. सभी क्षेत्रों में चुनौती दे रहीं हैं. कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमे महिलाये अपनी लोहा न मनवा रही है शिक्षा जगत हो , साहित्य का क्षेत्र हो ,. खेती हो जंगल में वन्य जंतु रक्षा का कार्य हो,सीमा पर दुश्मन के दांत खट्टे करने हो,अंतरिक्ष में परचम लहराना हो, ,एवरेस्ट की उंचाईयां नापना हो, ओलोम्पिक में धाक जमाना हो, बैंक चलाना हो, इंडस्ट्री सम्हालना हो, इंफ्रास्ट्रक्चर में कमाल दिखाना हो ,ट्रक चलना हो, या ट्रैन दौड़ाना हो कोई क्षेत्र नहीं बचा है हर क्षेत्र में अव्वल प्रमाणित कर रहीं हैं आज की महिलाये.......
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही )
संपादक - विद्रोही आवाज
मो - 8460783401 

Saturday, 4 March 2017

कन्या भ्रूण हत्या एक अभिशाप


मेरी हत्या न करो माँ
मैं तेरा ही अंश हूँ माँ
पिताजी को समझा दो माँ
पिताजी को मना लो माँ
मुझे बहुत बार इस तरह की आवाज हर समाज की बेटियो की कानो में गूँजती है ! आप भी महसूस करे जरूर आस पास आपको यह आवाज गूंजती हुई महसूस होगी अब मुख्य पीड़ा की और आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा ------- 
कन्या भ्रूण हत्या के रूप में हम अपनी जल्लाद मानसिकता के साथ सांस्कृतिक पतन की सूचना संसार को दे रहे हैं। यह महापाप है। अक्सर इसके लिए स्त्रियों को जिम्मेदार ठहराकर "स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है" वाला रटा रटाया फार्मूला सुनते है। सच तो यह है कि हम पुरुषो ने भ्रूणहत्या में अपने दोष को कभी देखा ही नही या देखकर खुद को नजर अंदाज कर दिया है ! पुरुष प्रधान भारतीय समाज में सक्षम स्त्री भी हर फैसले के लिए पुरुष का मुंह ताकती हैं। वह प्रणय क्रीड़ा में सहभागी होना चाहती है या नहीं, गर्भ निरोधक इस्तेमाल करे या ना करे, कितने बच्चों को कब जन्म दे, वे लड़के होंगे या लड़कियां, उन्हें शिक्षा कहां और कितनी देनी हैं- ये सब पुरुष तय करता है। जहां स्त्री का अपनी देह पर अधिकार नहीं होगा वहां कन्या भ्रूण हत्या तो होगी ही। अधिकांश मामलों में स्त्री विवश कर दी जाती है और न करने की स्थिति में उसका जीना हराम कर दिया जाता है। कन्या भ्रूण हत्या के लिए पुरुष ही पूर्णत: जिम्मेदार हैं। मरने के मुखाग्नि देने, तर्पण करने, वंशवृद्धि और संपत्ति के उत्तराधिकार के लिए कुलदीपक" अर्थात् पुत्र की चाह होती है। चाहे उसके कारनामे कुल-काजल क्यों न हों। पुरुष, पुत्रजन्म को अपनी मर्दांनगी से जोड़ते हैं। कन्या भ्रूण हत्या 21वीं सदी के माथे पर कलंक है। स्त्री के अस्तित्व को गर्भ में ही नष्ट करने का कुकृत्य हो रहा है। "प्राइवेट क्लिनिक" कुकुरमुत्ते की तरह उग आये हैं जो समाज की इस रुग्ण मानसिकता को अपने हक में भुनाकर चांदी काट रहे हैं। मुख्यतया सभी समाज में तो दुल्हनें अन्य समाज से "आयात" करनी पड़ रही हैं। कही परिवार तो ऐसे जहां राखी बांधने के लिए बहनें ही नहीं हैं।
स्त्री पुरुषों का अनुपात, खतरनाक रूप से असन्तुलित हो चुका है। प्रकृति के साथ यह क्रूर मजाक समाज पर ही भारी पड़ रहा है। जिस समाज की नैतिक चेतना सदियों से कुभकर्णी नींद में हो, उसे जगाने के लिए आज पुन: ढोल-नगाड़ों की जरूरत है। केवल कानून बनाना जरूरी नहीं, उसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। गैरसरकारी सामाजिक संगठनों से भी सन्देश पहुंचना चाहिए। शिक्षक ही नहीं, धर्म गुरु भी इसमें अपनी भूमिका तय करें, शास्त्रों में ईश्वर को "त्वं स्त्री" कहकर नारी रूप में आराधना की गई हैं, क्योंकि नारी अपनी सीमाओं में संपूर्णता की वाहक है।सामाजिक रूढ़ियां, पूर्वाग्रह, दहेज, शिक्षा-ब्याह पर होने वाला खर्च (क्योंकि लड़की को दूसरे घर जाना होता है) और असामाजिक आचरण से उसकी रक्षा, ऐसे कई कारण हैं जो कन्या भ्रूण हत्या के गर्भ में हैं। कन्या को मार दो और जिन्दगी भर के लिए बिंदास हो जाओ- पर इस नीच वृत्ति के लोग यह नहीं सोचते कि उनकी अगली पीढ़ी को शादी के लिए लड़कियां कहां से मिलेंगी। वे स्वयं भी तो किसी स्त्री से जन्मे हैं। कन्या भ्रूण हत्या के रूप में वे आत्मघात ही कर रहे हैं।
हमें बेटी को पराया धन और बेटे को कुल दीपक की मानसिकता से ऊपर उठने की जरूरत है। यह सोचा जाना भी आवश्यक है कि भ्रूण हत्या करके हम किसी को अस्तित्व में आने से पहले ही खत्म कर देते हैं। आज के दौर में बेटीयां बेटे से कमतर नहीं है। इस गलत परम्परा को रोकने के लिये हम सभी को मिलकर तेजी से अभियान चलाना होगा। ओर मेरा सपना भी है (जैन वाणी फाउंडेशन ) जिसकी रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है ! आज हमे सरकारी सहयोग की अपेक्षा हमें नही करनी चाहिये। इस मामले में कानून भी लाचार सा ही दिखता है। जाँच सेन्टरों के बाहर बोर्ड पर लिख देने से कि "भ्रूण जाँच किया जाना कानूनी अपराध है।" उन्हें इसका भी लाभ मिला है। जाँच की रकम कई गुणा बढ़ गई। रोजाना गर्भपात के आंकड़े चौकाने वाले बनते जा रहे हैं, चुकिं भारत में गर्भपात को तो कानूनी मान्यता है, परन्तु गर्भाधारण के बाद गर्भ के लिंक जाँच को कानूनी अपराध माना गया है। यह एक बड़ी विडम्बना ही मानी जायेगी कि इस कानून ने प्रचार का ही काम किया। जो लोग नहीं जानते थे, वे भी अब गर्भधारण करते वक्त इस बात की जानकारी कर लेते हैं कि किस स्थान पर उन्हें इस बात की जानकारी मिल जायेगी कि होने वाली संतान नर है या मादा। धीरे-धीरे लिंगानुपात का आंकड़ा बिगड़ता जा रहा है। यदि समय रहते ही हम नहीं जागृत हुए तो इस बेटे की चाहत में हर इंसान जानवर बन जायेगा। भले ही हम सभ्य समाज के पहरेदार कहलाते हों, पर हमारी सोच में भी बदलाव लाने की जरूरत है !
उत्तम जैन(विद्रोही)
लेखक - पत्रकार - संपादक
विद्रोही आवाज़
mo-8460783401
नोट - मेरे इन विचारो से आप अगर प्रभावित है ! मेरा अनुरोध और इन विचारो से आप सहमत है तो सिर्फ इस पोस्ट को बिना कांट छांट किये व् लेखक का नाम हटाये बिना श्योसल मिडिया ( व्ह्ट्स अप , फेसबुक , ट्विटर , अपने समाचार पत्रों में जरुर स्थान दे / फोरवर्ड करे ! अगर कुछ दो चार महानुभाव भी भ्रूण हत्या नही करेगे तो मेरा लेखन सफल हो जायेगा !

वर्तमान की शिक्षा प्रणाली - मेरा दर्द


देश को बदलना है तो शिक्षा का प्रारूप बदलो
आज एक पुस्तक पर मेरी नजर पड़ी जिसमे लिखा था --जिस शिक्षा से हम अपने जीवन का निर्माण कर सके , मनुष्य बन सके , चरित्र गठन कर सके और विचारो का सामंजस्य कर सके वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है ... स्वामी विवेकानन्द की यह पंक्तिया आज मेने  जब पढ़ी कुछ दिनों पूर्व की शिक्षा से जुडा मेरा मानसिक तनाव कहू या या मेरी शिक्षा की वर्तमान प्रणाली पर मेरा चिंतनीय विषय ने मुझे लिखने को मजबूर कर दिया ! क्यों की एक वर्ष  पूर्व ही मेरे एक मित्र के  पुत्र 12 वि में वाणिज्य संकाय में गुजरात बोर्ड में अपेक्षितअंको/ प्रतिशत से कम 51 प्रतिशत ही प्राप्त कर पाया !  मेरे मित्र को मानसिक तनाव तो परिणाम आने के बाद बढ़ ही गया था क्यों की उसका  पुत्र B.B.A में दाखला लेना चाहता था मगर परिणाम के प्रतिशत को देखते हुए वीर नर्मद यूनिवर्सिटी से पहले व् दुसरे चक्र में उसका नाम किसी महाविद्यालय में नामित नही हुआ ! वर्तमान में आज के हताश विद्यार्थी के आत्महत्या के किस्से सुन में डर के मारे मेंरा मित्र अपने   पुत्र को प्रतिदिन होंसला देता रहता था चिंता न करो दाखला हो जायेगा ! मेरा मित्र अपने पुत्र को चिंतित देख  खुद मानसिक तनाव में था ! मेरे मित्र ने मुझसे बोला अपनी समस्या से अवगत कराया और  मुझे साथ लिया और हम खुद पहुच गये  स्वयं निर्भर(सेल्फ फायनेंस ) महाविद्यालय में जहा दूसरी यूनिवर्सिटी से M.M.A नामक कोई कोर्स जिसे 5 वर्ष में पूर्ण करने पर B.B.A व् M.B.A की ऐसी ही कुछ डिग्री मिलेगी ! मरता क्या न करता दाखला लेने को तेयार हुआ और हमे  बताया गया 1 लाख डोनेशन प्रवेश के लिए व् प्रति सेमेस्टर (छह माह ) फीस ३१५०० /- भुगतान करना पड़ेगा ! मेरा मित्र ठहरा  साधारण व्यक्ति और उसके  सामने आँखों के आघे अँधेरा छा गया ! मुह लटकाकर बिना कुछ बोले जेहन में एक दर्द लेकर बाहर निकला ! अब मानस पटल पर मेरे विचार शिक्षा पर आये प्रेषित ----
शिक्षा का व्यवसायीकरण या बाजारीकरण आज देश के समक्ष बड़ी चुनौती हैं !
किसी भी समस्या का समाधान चाहते है तो उसकी जड़ में जाने की आवश्यकता होती है। शिक्षा में वर्तमान का व्यवसायीकरण का कारण क्या है? उसका समाधान क्या हो? कुछ लोग ऐसा भी तर्क देते है कि शिक्षा का विस्तार करना है या सर्वसुलभ कराना है तो मात्र सरकार के द्वारा संभव नहीं है, निजीकरण आवश्यक है और जो व्यक्ति शिक्षा संस्थान में पैसा लगायेगा वह बिना मुनाफे क्यों विद्यालय,महाविद्यालय खोलेगा?यह तर्क भी बिल्कुल सही है कुछ लोग इससे भी आगे बढ़कर कहते है कि देश की शिक्षा का विस्तार एवं विकास करने हेतु विदेशी शैक्षिक संस्थाओं के लिए द्वारा खोलने चाहिए। वैश्वीकरण के युग में इसको रोका नहीं जा सकता आदि प्रकार के विभिन्न तर्क दिये जा रहे है। यह सारे तर्क तथाकथित सभ्रांत वर्ग के द्वारा ही दिये जाते है। अगर मुख्य मुद्दे पर नजर डाली जाये तो पूर्व में शैक्षिक संस्थाए या तो सीधे तोर पर सरकार चलाती थी या सरकार के अनुदान से संस्थाएं चलती थी। विद्यार्थियों का निष्चित शुल्क शिक्षकों का निष्चित वेतन एवं संस्था चलाने हेतु अनुदान जैसी व्यवस्थाए बनी। कुछ समय के बाद सरकारी शैक्षिक संस्थाओं के स्तर में लगातार गिरावट आती गई। इस कारण से निजी विद्यालयों का आकर्षण बढ़ा शुरू में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में वस्तुओं के रूप में दान लेना शुरू हुआ। आगे जाकर छात्र से बड़ी मात्रा में दान लेना, शिक्षकों की निुयक्ति में पैसा लेना और कम वेतन देना शुरू हुआ। विद्यालयों में शिक्षा के स्तर गिरने से ट्यूशन प्रथा प्रारम्भ हुई। क्रमशः शिक्षा का स्वरूप धन्धे जैसा बनने लगा।यह सब कार्य शासन-प्रशाासन एवं शिक्षा माफियाओं की मिलीभगत से होने लगे। जिसका आज इस प्रकार विभत्स स्वरूप बन गया कि शिक्षा यह सब्जी मंडी का बाजार जैसे हो गई है । आज अराजकता का माहौल है। शुल्क न भर सकने के कारण छात्र आत्महत्याएं कर रहे है। अभिभावक इस हेतु गलत कार्य करने को मजबूर है। एक प्रकार से व्यवसायिक उच्च-शिक्षा उच्च मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग को छोड़कर अन्य किसी भी वर्ग के बस की बात नही रही। प्रष्न उठता है इस प्रकार के लगभग 20 प्रतिशत वर्ग को छोड़कर 80 प्रतिशत वर्ग के बच्चे प्रतिभावन नहीं है क्या? इससे देश की प्रतिभाएं भी कुठित हो रही है। इन सारी परिस्थितियों के कारण वर्तमान में शिक्षा का मात्र बजारीकरण नहीं हुआ है। एक प्रकार से अतिभ्रष्ट व्यापार हो गया है। इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र किस प्रकार के निर्माण होगे? और इस प्रकार के छात्र देश के विभिन्न क्षेत्रों का नेतृत्व करेंगे तब देश का चरित्र कैसा बनेगा? यह बड़ा प्रश्न है। देश में भ्रष्टाचार, अनाचार, चरित्र-हीनता बढ़ रही है उसकी चिंता करने से कुछ परिणाम नहीं होगा। जब तक शिक्षा का बाजारीकरण नहीं रूकेगा तब तक बाकी सारी गलत बातें बढ़ना स्वाभाविक है। देश की सभी समस्याओं की जड़ वर्तमान शिक्षा है। इसके लिए कुछ मेरे समाधान हेतु सुझाव की शिक्षा प्रणाली केसी हो -शिक्षा के व्यापारीकरण, बाजारीकरण को रोकने हेतु केन्द्र सरकार कानून बनाये।
1. शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार पर रोक लगे।
2 .विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए भारत के शैक्षिक संस्थानों से भी कड़े कानून हो। उनका प्रत्ययायन एवं मूल्यांकन उस देश में तथा भारत में भी हो ।
अपने देश की विशेष करके सरकारी शैक्षिक संस्थानों की गुणवत्ता सुधार हेतु ठोस योजना बनें।
३. उच्च शिक्षा विशेषकरके व्यवसायी उच्च शिक्षा को मात्र निजी भरोसे पर न छोड़ा जाए। सरकार के द्वारा भी नये शैक्षिक संस्थान शुरू करने की योजना बनें।
शिक्षा की भारतीय संकल्पना को पुनः स्थापित करने हेतु प्रयास किये जाएं।
शिक्षा मात्र सरकार का दायित्व न होकर समाज भी अपने दायित्व का निर्वाह करें।..... सुझाव तो बहुत है मगर सिर्फ ३ सुझाव पर भी ध्यान दे दिया जाये तो शिक्षा जगत में काफी परिवर्तन हो सकता है
उत्तम जैन (विद्रोही )

मो- ८४६०७८३४०१ 

जैन समाज कि- एक कुरीति आरती

घर के कार्यों में धर्म का अनुसरण नहीं होता है, किन्तु आरती से जो जीवों का घात होता है वह धर्म के नाम पर होता है ! अतः आरती करना किसी विज्ञ और दयालु पुरुष का ध्येय नहीं हो सकता !
"देव धर्मतपस्विनाम् कार्ये महति सत्यपि !
जीव घातो न कर्तव्यः अभ्रपातक हेतुमान !!
याने,
देव, धर्म और गुरुओं के निम्मित भी महान से महान कार्य पड़ने पर जीव घात नहीं करना चाहिए ! जो इसकी परवाह नहीं करते वे जिनेन्द्र भगवान के वचन रूपी चक्षुओं से रहित हैं !जीव-घात नियम से ही नरकादि गतियों में ले जाने वाला है और ऊपर से अगर धर्म मान कर ऐसा कार्य किया जाए तो उसमे "मिथ्यात्व' का दोष भी जोड़ लें, जो कि अनंत संसार का मूल कारण है ! अन्य स्थानों में किया गया पाप मंदिरजी जाकर कट जाता है, किन्तु धर्मस्थान में किया हुआ पाप, वज्र लेप समान है ! जिसे कोई नहीं काट सकता !
याद रखें :- आरती का सम्बन्ध दीपक से कदापि नहीं है !
आरती का अर्थ केवल स्तुति और गुणगान से ही है, उसके अलावा कुछ भी नहीं !
- अब कोई कहे की मंदिरजी में बड़े-बड़े बल्ब/लाइट/जनरेटर जलते हैं रात में तो उससे भी तो तीव्र हिंसा होती है  इसके २ समाधान बनते हैं :-
१ - आज के भौतिकवादी हो चुके समाज में श्रावकों की इतनी श्रद्धा नहीं रही जैसी पहले हुआ करती थी ! यह पंचम काल का प्रभाव ही है कि यदि मंदिरों में बल्ब नहीं जलाये तो स्वाध्याय तो दूर मंदिरजी आने-जाने का क्रम भी लुप्त हो जाएगा!
जबकि विवेकवान पुरुष तो रात्रि के समय में सब आरम्भ-परिग्रहों से विरक्त होकर सामायिक आदि क्रियाओं में लग जाते हैं !
दूसरा और सबसे मुख्य तथ्य
२ - मंदिरजी में बल्ब/लाइट जलाना धर्म नहीं माना जाता, किन्तु दीपक जलकर आरती करने को लोग धर्म मानते हैं, और उल्टी/विपरीत मान्यता होने के कारण मिथ्यात्व ही है ! हमे विवेक का परिचय करते हुए, इस प्रचलित प्रथा को सही दिशा देने का प्रयास करना चाहिए तथा रूढ़िवाद, अज्ञानता और पक्षपात को छोड़कर जैसा भगवान ने बतलाइं वैसी ही क्रियाएँ करनी चाहिए !
- पर्वों/आयोजनों में 108,1008 दीपकों से महाआरती की जाती है !
- कभी कभी सुनता हु अमुक महाराज जी की 25,000 दीपकों से महाआरती की जाएगी ! कल्पना से परे हैं ऐसे भक्त और ऐसे मुनि ... - जहाँ "अहिंसा परमो धर्म" बताया है, वहां हिंसा का अनुसरण करती हुई किसी क्रिया को कोई साधु या कोई श्रावक कदापि नहीं कर सकता ! किन्तु फिर भी बहुत कर रहे हैं ! पंचम काल प्रभावी हो रहा है ! - अखंड ज्योत जलाना भी मूढ़ता है ! वैष्णव परंपरा की नकल मात्र है ! कृपया विवेक से काम लें !!! जो पहले से होता आ रहा है ज़रूरी तो नहीं कि वो सही ही हो ! वेसे श्वेतांबर परंपरा के तेरापंथ , स्थानकवासी परंपरा मे मूर्ति पुजा को मान्यता नही है ! साधना , स्वाध्याय बिना पुजा के भी संभव है ! जैन समाज के साधू , संतो , आचार्यो , श्रावकों को इस गहन विषय पर विचार करना चाहिए ! क्या आरती , द्रव्य पुजा , अभिषेक आदि से हिंसा तो नही हो रही है जो जैन धर्म का मूल सिदान्त है ! जैन समाज को आज सिर्फ हिंदुस्तान ही नही विश्व मे अहिंसक के रूप मे जाना जाता है ! जहा अहिंसा परमो धर्म का ध्वज फहराया जाता है !
उत्तम जैन विद्रोही

Wednesday, 1 March 2017

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देना क्या देश में जहर के बीज बोना नहीं है?

 
मिर्जापुर में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने सारी संवैधानिक और सामाजिक मर्यादाएं तोड़ते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुलेआम को मंच से हि...... और सा....... जैसी गन्दी गालियां दी. कौन कहता है कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नहीं है? कुछ भी बोलने की भारत जैसी खुली छूट तो दुनिया के अन्य किसी भी देश में नहीं है.
आज हिंदुस्तान में एक ओर जहाँ नेता खुलेआम चुनावी मंचों से बदजुबानी पर उतर आए हैं, वहीँ दूसरी तरफ छात्र नेता कॉलेजों में हंगामे ओर नारेबाजी करके वहां का माहौल खराब किये हुए हैं. अफसोसनाक बात तो यह है कि शिक्षक भी अब धड़ों में बंट न सिर्फ अपने-अपने पसन्दीदा ग्रुप के छात्रों के साथ हो लिए हैं, बल्कि प्रदर्शन और नारेबाजी करते हुए सड़कों तक पर उतर आये हैं. भारत की बिकाऊ व चरित्र से गिरी हुई मीडिया सनसनी फैलाने और हंगामा खड़ा करने में महारत हासिल कर चुकी है ! जेसे देश में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का ठेका पूरी मीडिया ने ही ले लिया है और आज के युग में खुली व अमर्यादित बहस का सबसे लोकप्रिय मंच बन चुकी सोशल मीडिया तिल का ताड़ बनाने में पूर्णतः दक्ष हो चुकी हैं.!जिन्हे भले चव्व्नी का ज्ञान नही पर ज्ञान पेलने मे माहिर है
सोशल मीडिया पर सभ्य-असभ्य, संस्कारी-कुसंस्कारी हर तरह के लोंगों का संगम होता है. इसलिए आप कोई बयान दे रहे हैं तो पाठकों की तीखी प्रतिक्रिया और कड़े विरोध के लिए भी तैयार रहना चाहिए.अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मैं पूरा समर्थन करता हूँ, किन्तु जो स्वतंत्रता अमर्यादित हो और देश को तोड़ने का काम करे, उसका मैं विरोधी हूँ. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाले लोग आतंक से पीड़ित कश्मीर सहित देश के कई नक्सल प्रभावित जगह के वासिंदों को पीड़ित बता उनके हित की बात करते हैं, लेकिन वो शहीद होने वाले पुलिस और सुरक्षाबलों की बात नहीं करते हैं. वो आतंकियों से हमदर्दी रखते हैं, लेकिन आतंकी जिन्हें गोली मारते हैं, उनसे कोई सरोकार नहीं रखते हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उन्हें देना क्या देश में जहर के बीज बोना नहीं है? जनता के द्वारा चुने हुए और देश के संवैधानिक पद पर आसीन प्रधानमंत्री को खुलेआम गन्दी गालियां देने वाले लालू प्रसाद यादव का इलाज क्या है? क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग नहीं है? अनेक घोटालों में सजायाफ्ता और जमानत पर रिहा लोग देश के प्रधानमंत्री की बेइज्जती करें यह देश की जनता और माननीय सुप्रीम कोर्ट दोनों को ही कदापि बर्दास्त नहीं करना चाहिए.......
लेखक - उत्तम जैन (विद्रोही )
प्रधान संपादक - विद्रोही आवाज़ 

Tuesday, 28 February 2017

68 वा अणुव्रत स्थापना दिवस 1 मार्च 2017 पर विशेष - उत्तम जैन (विद्रोही )

अणुव्रत का प्रारंभ आचार्य तुलसी (तेरापंथ धर्म संघ के नोवें आचार्य) द्वारा 1 मार्च 1949 में राजस्थान के सरदारशहर कस्बे में हुआ। उस समय एक और देश सांप्रदायिक ज्वाला में जल रहा था, वहां दूसरी और सभी प्रमुख लोग देश के भौतिक निर्माण में विशेष अभिरूचि ले रहे थे | अणुव्रत आन्दोलन ने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए सभी धर्म-सम्प्रदाय के प्रमुख -पुरुषों को एक मंच पर लाकर यह समझाने की कौशिश की गयी कि धर्म के मौलिक सिदान्त एक हैं। जो भिन्नता दिखाई दे रही है वह या तो एकांत आग्रह कि देन है या फिर सांप्रदायिक स्वार्थों के कारण उसे उभरा जा रहा है। इस द्रष्टि से विशाल सर्व धर्म सदभाव सम्मलेन आयोजित किये गए और अणुव्रत का मंच एक सर्वधर्म सदभाव का प्रतिक बन गया। भारतीय धर्म सम्प्रदायों के अतिरिक्त इसाई तथा मुसलमान सम्प्रदायों के साथ भी एक सार्थक संवाद बना और अनेक ईसाई तथा मुसलमान लोगों ने भी अणुव्रत के प्रचार-प्रसार में रूचि दिखाई। जगद्गुरु शंकराचार्य, दलाई लामा, ईसाई पादरी, मुसलमान संतो ने भी इसमें भाग लिया।
आचार्य तुलसी द्वारा अणुव्रत : आचार संहिता बनाई गयी जो 68 वर्ष पूर्व भविष्य को देखकर जो अणुव्रत : आचार संहिता बनाई वह आज वर्तमान मे देखा जाए सबसे जरूरी है ! ......
मैं किसी भी निरपराध प्राणी का संकल्पुर्वक वध नहीं करूँगा |
आत्म हत्या नहीं करूँगा |
भ्रूण हत्या नहीं करूँगा |
मैं आक्रमण नहीं करूँगा |
आक्रामक नीति का समर्थन नहीं करूँगा |
विश्व शांति तथा निःशस्त्रीकरण के लिए प्रयत्न करूँगा |
मैं हिंसात्मक एवं तोड़-फोड़ -मूलक परवर्तियों में भाग नहीं लूँगा |
मैं मानवीय एकता में विश्वास करूँगा |
जाती, रंग आदि के आधार पर किसी को उंच-नीच नहीं मानूंगा |
अस्पर्श्यता नहीं मानूंगा |
मैं धार्मिक सहिष्णुता रखूँगा |
सांप्रदायिक उतेजना नहीं फेलाऊंगा|
मैं व्यवसाय और व्यवहार में प्रामाणिक रहूँगा|
अपने लाभ के लिए दूसरों को हानि नहीं पहुंचाउंगा |
छलनापूर्ण व्यवहार नहीं करूँगा |
मैं ब्रह्मचर्य की साधना और संग्रह की सीमा का निर्धारण करूँगा |
मैं चुनाव के संबध में अनैतिक आचरण नहीं करूँगा |
मैं सामजिक कुरुढीयों को प्रश्रय नहीं दूंगा |
मैं व्यसन मुक्त जीवन जियूगा |
मादक पदार्थों का ---शराब, गंजा, चरस, हेरोइन, भांग, तंबाकू आदि का सेवन नहीं करूँगा |
मैं पर्यावरण की समस्या के प्रति जागरूक रहूँगा|
हरे-भरे वृक्ष नहीं काटूँगा|
पानी, बिजली, आदि का अपव्यय नहीं करूँगा |(अणुव्रती के लिए सम्बंधित वर्गीय अणु व्रतों का पालन अनिवार्य है)
अणुव्रत आंदोलन के प्रहरी व अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य तुलसी द्वारा प्रतिपादित नैतिक मूल्यों से ओत प्रोत जाती सम्प्रदाय से मुक्त छोटे छोटे नियमो से आम जन में कैसे नैतिकता का विकास हो जीवन के नैतिक मूल्यों के हास्य को बचाया जा सके इसके लिये इसकी स्थापना की । साधुओं के व्रत को यदि उत्कृष्ट मार्ग कहा जाए और हिंसा व बुराईयों के मार्ग को अधम मार्ग कहा जाए तो इन दोनों मार्गों पर न चल पाने वाले मानवों के जीवन के लिए अणुव्रत का मध्यम मार्ग बनता है। साधुओं के पांच महाव्रत होते हैं, जिनका पालन साधारण मानव के लिए मुश्किल हो सकता है और आदमी पूर्णतया अधम का मार्ग भी नहीं अपना सकता तो उसके लिए अणुव्रत एक ऐसा माध्यम है जो उसके जीवन को सुख, शांति व समृद्धि की ओर ले जाता है। इसकी एक आदर्श आचार संहिता बनाई आचार्य तुलसी ने। उन्होंने इसका शुभारंभ इस आधार पर किया कि अणुव्रत के नियमों का पालन करने वाले के लिए किसी जाति, धर्म व संप्रदाय का होने कोई मायने नहीं रखता। यहां तक कि जिस व्यक्ति को किसी भी धर्म में आस्था ना हो, वह नास्तिक हो तो अणुव्रत का अनुपालन कर सकता है।आचार्य तुलसी ने अणुव्रत के रूप में एक दीपक जलाया जो आज हजारों दीपकों को जला मानव जीवन को अंधकार से दूर करने का काम कर रहा है। आज आदमी के जीवन में हिंसा, लोभ, मोह, गुस्सा आदि का जो अंधकार फैला हुआ है उसे इस अणुव्रत के छोटे-छोटे नियम से दूर भगाया जा सकता है। सभी नियम एक दीए के समान हैं जो मानव जीवन को प्रकाशित करने का काम कर रहे हैं। जीवन के अंधकार को दूर करने के लिए अणुव्रत की दीप मालाएं सभी को जलानी होगी। अणुव्रत के आधार के तीन संकल्प सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति में अणुव्रत का सार समाहित हो गया है। क्योंकि हिंसा, चोरी, गुस्सा आदि ही तो आदमी की जीवन की सभी बुराईयों का जड़ है। इन बुराइयों को ही समाप्त करने के लिए अणुव्रत का शुभारंभ हुआ तथा अणुव्रत का सार बन गया सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति। आचार्य श्री तुलसी के बाद अणुव्रत को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आचार्य महाप्रज्ञ जी ने राजस्थान से कन्याकुमारी व राजस्थान से कोलकाता सहित देश के कई राज्यों का भ्रमण कर लोगों में इस दीप प्रज्जवलित किया। अणुव्रत की आवश्यकता इसलिए हुई क्योंकि इस कलियुग में आज हर व्यक्ति में त्याग की चेतना की जगह भोग चेतना, पदार्थ चेतना, स्वार्थ चेतना ही घर कर रही है। व्यक्ति अपने मूल उद्देश्य से भटकता जा रहा है। भारत की आजादी के बाद तो धर्म और देश ती परिस्थितियां काफी बदल चुकी है। देखा जाये तो पूर्व पश्चिम में समा रहा है तो पश्चिम पूरब की तरफ आ रहा है। सभी सुख चाहते है। सुख तो कही भी मिल सकता है। लेकिन लोगों में उसे खोजने का तरीका अलग-अलग है। लोग स्वार्थ में, पदार्थ में या भोग में सुख की खोज करते है जबकि परम सुख है अणुव्रत और संयम। अणुव्रत के नियमों का पालन करके चरित्र निर्माण किया जा सकता है।
जिस देश के नागरिकों का चरित्र अच्छा होता है वह राष्ट्र हमेशा उन्नत रहता है। उन्होंने कहा कि सभी कहते है जियो और जीने दो, लेकिन इसके साथ संयम शब्द को और जोडकर कहना चाहिये कि संयम से जीयो और संयम से जीने दो। अणुव्रत का मतलब है छोटे-छोटे व्रत। श्रावक वह है जिसके जीवन में व्रत होते है। इन व्रतों से व्यक्ति अपनी चेतनाओं को विकसित कर सकता है। जब तक 12 व्रतों की उपासना हम नही करेंगे तब तक जैनी नही कहलायेंगे। यदि हम एक समान तपस्या करेंगे तो सभी एक समान ही बनेंगे। हमें तीर्थंकरों के जीवन से प्रेरणा लेकर कषायमुक्त जीवन जीने की कला सीखनी चाहिये। अणुव्रत का सिद्धान्त लोगों को प्रेरणा देता है और अहिंसक बनाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही )
प्रधान संपादक - विद्रोही आवाज़